Rigveda / 8 / 1 / 7
क्वे॑यथ॒ क्वेद॑सि पुरु॒त्रा चि॒द्धि ते॒ मन॑: । अल॑र्षि युध्म खजकृत्पुरंदर॒ प्र गा॑य॒त्रा अ॑गासिषुः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 1 | Mantra No : 7
In English:
Seer : medhaatithimedhyaatithii kaaNvau | Devta : indra: | Metre : viraaDbRRihatii | Tone : madhyamaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : kveyatha kvedasi purutraa chiddhi te manaH . alarShi yudhma khajakRRitpura.mdara pra gaayatraa agaasiShuH .
Component Words : kva . iyatha . kva . it . asi . puru.atraa . chit . hi . te . manaH . alarShi . yudhma . khaja.akRRit . puram.adara . pra . gaayatraaH . agaasiShuH . 8.1.7
In Hindi:
ऋषि : मेधातिथिमेध्यातिथी काण्वौ | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराड्बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : अब परमात्मा को सर्वव्यापक कथन करते हैं।
पदपाठ : क्व॑ । इ॒य॒थ॒ । क्व॑ । इत् । अ॒सि॒ । पु॒रु॒ऽत्रा । चि॒त् । हि । ते॒ । मनः॑ । अल॑र्षि । यु॒ध्म॒ । ख॒ज॒ऽकृ॒त् । पु॒र॒म्ऽद॒र॒ । प्र । गा॒य॒त्राः । अ॒गा॒सि॒षुः॒ ॥ ८.१.७
पदार्थ : (युध्म, खजकृत्) हे युद्धकुशल, युद्ध करनेवाले (पुरन्दर) अविद्यासमूहनाशक परमात्मन् ! (क्व, इयथ) आप किस एक देश में विद्यमान थे (क्व, इत्, असि) आप कहाँ विद्यमान हैं ? यह शङ्का नहीं करनी चाहिये (हि) क्योंकि (ते, मनः) आपका ज्ञान (पुरुत्रा, चित्) सर्वत्र ही है (अलर्षि) आप अन्तःकरण में विराजमान हो (गायत्राः) स्तोता लोग (प्रागासिषुः) आपकी स्तुति करते हैं ॥७॥
भावार्थ : इस मन्त्र में प्रश्नोत्तर की रीति से परमात्मा की सर्वव्यापकता बोधन की गई है, जिसका भाव यह है कि हे परमात्मन् ! आप पहले कहाँ थे, वर्तमान समय में कहाँ हैं और भविष्य में कहाँ होंगे ? इत्यादि प्रश्न परमात्मा में नहीं हो सकते, क्योंकि वह अन्य पदार्थों की न्याईं एकदेशावच्छिन्न नहीं, अपने ज्ञानस्वरूप से सर्वत्र विद्यमान होने के कारण मन्त्र में “पुरुत्रा चिद्धिते मनः” इत्यादि प्रतीकों से उसको सर्वव्यापक वर्णन किया गया है, इसलिये उचित है कि परमात्मा को सर्वव्यापक मानकर जिज्ञासु उसके ज्ञानरूप प्रदीप से अपने हृदय को प्रकाशित करें और किसी काल तथा किसी स्थान में भी पापकर्म करने का साहस न करें, क्योंकि वह प्रत्येक स्थान में हर समय हमारे कर्मों का द्रष्टा है ॥७ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : मेधातिथिमेध्यातिथी काण्वौ | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराड्बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : अथ परमात्मनो विभुत्वं वर्ण्यते।
पदपाठ : क्व॑ । इ॒य॒थ॒ । क्व॑ । इत् । अ॒सि॒ । पु॒रु॒ऽत्रा । चि॒त् । हि । ते॒ । मनः॑ । अल॑र्षि । यु॒ध्म॒ । ख॒ज॒ऽकृ॒त् । पु॒र॒म्ऽद॒र॒ । प्र । गा॒य॒त्राः । अ॒गा॒सि॒षुः॒ ॥ ८.१.७
भावार्थ :