Rigveda / 8 / 1 / 8
प्रास्मै॑ गाय॒त्रम॑र्चत वा॒वातु॒र्यः पु॑रंद॒रः । याभि॑: का॒ण्वस्योप॑ ब॒र्हिरा॒सदं॒ यास॑द्व॒ज्री भि॒नत्पुर॑: ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 1 | Mantra No : 8
In English:
Seer : medhaatithimedhyaatithii kaaNvau | Devta : indra: | Metre : nichRRidbRRihatii | Tone : madhyamaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : praasmai gaayatramarchata vaavaaturyaH pura.mdaraH . yaabhiH kaaNvasyopa barhiraasada.m yaasadvajrii bhinatpuraH .
Component Words : pra . asmai . gaayatram . archata . vavaatuH . yaH . param.adaraH . yaabhiH . kaaNvasya . upa . barhiH . aa.asadam . yaasat . vajrii . bhinat . puraH . 8.1.8
In Hindi:
ऋषि : मेधातिथिमेध्यातिथी काण्वौ | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृद्बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : अब विद्वानों को परमात्मा के ज्ञान का प्रचार करना कथन करते हैं।
पदपाठ : प्र । अ॒स्मै॒ । गा॒य॒त्रम् । अ॒र्च॒त॒ । व॒वातुः॑ । यः । प॒र॒म्ऽद॒रः । याभिः॑ । का॒ण्वस्य॑ । उप॑ । ब॒र्हिः । आ॒ऽसद॑म् । यास॑त् । व॒ज्री । भि॒नत् । पुरः॑ ॥ ८.१.८
पदार्थ : हे उपासको ! आप लोग (अस्मै) इस परमात्मा के लिये (गायत्रं, प्रार्चत) स्तुति करो (यः) जो परमात्मा (ववातुः, पुरन्दरः) उपासकों के विघात करनेवालों के पुरों का नाशक है (वज्री) शक्तिशाली परमात्मा (याभिः) जिन स्तुतियों से (काण्वस्य, बर्हिः) विद्वानों की सन्तान के हृदयाकाश में (आसदं, उपयासत्) प्राप्त होने के लिये आवे और (पुरः, भिनत्) अविद्या के समूह को भेदन करे ॥८॥
भावार्थ : भाव यह है कि वह पूर्ण परमात्मा काण्व=विद्वानों की सन्तान का अविद्यान्धकार निवृत्त करके उनके हृदय में विद्या का प्रकाश करे, ताकि वे विद्या के प्रचार द्वारा परमात्मज्ञान का उपदेश करते हुए लोगों को श्रद्धालु बनावें और परमात्मा के गुणों का कीर्तन करते हुए आस्तिकभाव का प्रचार करें ॥८ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : मेधातिथिमेध्यातिथी काण्वौ | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृद्बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : अथ विद्वद्भिः परमात्मोपदेशो वर्ण्यते।
पदपाठ : प्र । अ॒स्मै॒ । गा॒य॒त्रम् । अ॒र्च॒त॒ । व॒वातुः॑ । यः । प॒र॒म्ऽद॒रः । याभिः॑ । का॒ण्वस्य॑ । उप॑ । ब॒र्हिः । आ॒ऽसद॑म् । यास॑त् । व॒ज्री । भि॒नत् । पुरः॑ ॥ ८.१.८
भावार्थ :