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Rigveda / 8 / 1 / 11

यत्तु॒दत्सूर॒ एत॑शं व॒ङ्कू वात॑स्य प॒र्णिना॑ । वह॒त्कुत्स॑मार्जुने॒यं श॒तक्र॑तु॒: त्सर॑द्गन्ध॒र्वमस्तृ॑तम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 1 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : मेधातिथिमेध्यातिथी काण्वौ | देवता : इन्द्र: | छन्द : आर्षीबृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : अब परमात्मा की शक्ति से ही सूर्य्यादिकों का प्रकाशन कथन करते हैं।

पदपाठ : यत् । तु॒दत् । सूरः॑ । एत॑शम् । व॒ङ्कू इति॑ । वात॑स्य । प॒र्णिना॑ । वह॑त् । कुत्स॑म् । आ॒र्जु॒ने॒यम् । श॒तऽक्र॑तुः । त्सर॑त् । ग॒न्ध॒र्वम् । अस्तृ॑तम् ॥ ८.१.११

पदार्थ : (यत्) जो (सूरः) सूर्य्य (एतशं) गतिशील (आर्जुनेयं) भास्वर श्वेतवर्णवाले (कुत्सं) तेजोरूप शस्त्र तथा (वातस्य) वायुसम्बन्धी (वङ्कू) वक्रगति वाली (पर्णिना) पतनशील प्रकाशक और संचारकरूप दो शक्तियों को (वहत्) धारण करता हुआ (तुदत्) लोकों का भेदक बनता है, वह (शतक्रतुः) शतकर्मा परमात्मा ही (अस्तृतं) अनिवार्य्य (गन्धर्वं) गो=पृथिव्यादि लोकों को धारण करनेवाले सूर्य्य में (त्सरत्) गूढगति से प्रविष्ट है ॥११॥

भावार्थ : गतिशील इस सूर्य्य में आकर्षण तथा विकर्षणरूप दो शक्तियाँ पाई जाती हैं । उनका धाता तथा निर्माता एकमात्र परमात्मा ही है और सूर्य्य जैसे कोटानकोटि ब्रह्माण्ड के स्वरूप में ओतप्रोत हो रहे हैं, इसीलिये मन्त्र में उसको “शतक्रतुः”=सैकड़ों क्रियाओंवाला कहा है । सूर्य्य को “गन्धर्व” इसलिये कहा है कि पृथिव्यादि लोक उसी की आकर्षणशक्ति से ठहरे हुए हैं और वायुसम्बन्धी कहने का अभिप्राय यह है कि तेज की उत्पत्ति वायु से होती है, जैसा कि “तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः आकाशाद्वायुः वायोरग्निः” तैत्तिरीयोपनिषद् में वर्णन किया है कि वायु से अग्नि उत्पन्न हुई, इत्यादि प्रमाणों से सिद्ध है कि सूर्य्य-चन्द्रमादिकों का प्रकाश परमात्मा की शक्ति से ही होता है, अन्यथा नहीं ॥११ ॥