Rigveda / 8 / 1 / 12
य ऋ॒ते चि॑दभि॒श्रिष॑: पु॒रा ज॒त्रुभ्य॑ आ॒तृद॑: । संधा॑ता सं॒धिं म॒घवा॑ पुरू॒वसु॒रिष्क॑र्ता॒ विह्रु॑तं॒ पुन॑: ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 1 | Mantra No : 12
In English:
Seer : medhaatithimedhyaatithii kaaNvau | Devta : indra: | Metre : aarShiibRRihatii | Tone : madhyamaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : ya RRIte chidabhishriShaH puraa jatrubhya aatRRidaH . sa.mdhaataa sa.mdhi.m maghavaa puruuvasuriShkartaa vihruta.m punaH .
Component Words : yaH . RRIte . chit . abhi.ashriShaH . puraa . jatru.abhyaH . aa.atRRidaH . sam.adhaataa . sandhim . magha.avaa . puru.avasuH . iShkartaa . vi.ahrutam . punariti . 8.1.12
In Hindi:
ऋषि : मेधातिथिमेध्यातिथी काण्वौ | देवता : इन्द्र: | छन्द : आर्षीबृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : अब परमात्मा को ही सब दुःखों की निवृत्ति करनेवाला कथन करते हैं।
पदपाठ : यः । ऋ॒ते । चि॒त् । अ॒भि॒ऽश्रिषः॑ । पु॒रा । ज॒त्रुऽभ्यः॑ । आ॒ऽतृदः॑ । सम्ऽधा॑ता । स॒न्धि॑म् । म॒घऽवा॑ । पु॒रु॒ऽवसुः॑ । इष्क॑र्ता । विऽह्रु॑तम् । पुन॒रिति॑ ॥ ८.१.१२
पदार्थ : (यः) जो परमात्मा (अभिश्रिषः) दोनों सेनाओं के अभिश्लेष (ऋते, चित्) विना ही (जत्रुभ्यः) स्कन्धसन्धि से (आतृदः) पीड़ा उत्पन्न होने के (पुरा) पूर्व ही (सन्धिं) सन्धि को (सन्धाता) करता है और जो (मघवा) ऐश्वर्य्यशाली तथा (पुरुवसुः) अनेकविध धनवाला परमात्मा (पुनः) फिर भी (विह्रुतं) किसी प्रकार से विच्छिन्न हुए शरीर को (इष्कर्त्ता) संस्कृत=नीरोग करता है ॥१२॥
भावार्थ : मन्त्र में “जत्रु” शब्द सब शरीरावयव का उपलक्षण है अर्थात् शरीर में रोग तथा अन्य विपत्तिरूप आघातों के आने से प्रथम ही परमात्मा उनका संधाता और वही आध्यात्मिक, आधिभौतिक तथा आधिदैविक तीनों प्रकार के दुःखों की निवृत्ति करनेवाला है, इसलिये सबको उचित है कि उसी की आज्ञापालन तथा उसी की उपासना में प्रवृत्त रहें ॥१२ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : मेधातिथिमेध्यातिथी काण्वौ | देवता : इन्द्र: | छन्द : आर्षीबृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : अथ परमात्मैव सर्वदुःखानां निवर्तक इति कथ्यते।
पदपाठ : यः । ऋ॒ते । चि॒त् । अ॒भि॒ऽश्रिषः॑ । पु॒रा । ज॒त्रुऽभ्यः॑ । आ॒ऽतृदः॑ । सम्ऽधा॑ता । स॒न्धि॑म् । म॒घऽवा॑ । पु॒रु॒ऽवसुः॑ । इष्क॑र्ता । विऽह्रु॑तम् । पुन॒रिति॑ ॥ ८.१.१२
भावार्थ :