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Rigveda / 8 / 1 / 13

मा भू॑म॒ निष्ट्या॑ इ॒वेन्द्र॒ त्वदर॑णा इव । वना॑नि॒ न प्र॑जहि॒तान्य॑द्रिवो दु॒रोषा॑सो अमन्महि ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 1 | Mantra No : 13

In Hindi:

ऋषि : मेधातिथिमेध्यातिथी काण्वौ | देवता : इन्द्र: | छन्द : शङ्कुम्मतीबृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : अब यह वर्णन करते हैं कि मनुष्य किन−किन भावों से सद्गुणों का पात्र बनता है।

पदपाठ : मा । भू॒म॒ । निष्ट्याः॑ऽइव । इन्द्र॑ । त्वत् । अर॑णाःऽइव । वना॑नि । न । प्र॒ऽज॒हि॒तानि॑ । अ॒द्रि॒ऽवः॒ । दु॒रोषा॑सः । अ॒म॒न्म॒हि॒ ॥ ८.१.१३

पदार्थ : (इन्द्र) हे परमात्मन् ! (त्वत्) आपके अनुग्रह से हम लोग (निष्ट्याः, इव) नीच के समान तथा (अरणाः, इव) अरमणीय के समान (मा, भूम) मत हों और (प्रजहितानि) भक्तिरहित (वनानि) उपासकों के समान (न) न हों (अद्रिवः) हे दारणशक्तिवाले परमेश्वर ! आपके समक्ष (दुरोषासः) शत्रुओं से निर्भीक हम आपकी (अमन्महि) स्तुति करते हैं ॥१३॥

भावार्थ : इस मन्त्र में यह वर्णन किया है कि विद्या तथा विनय से सम्पन्न पुरुष में सब सद्गुण निवास करते हैं अर्थात् जो पुरुष परमात्मा की उपासनापूर्वक भक्तिभाव से नम्र होता है, उसके शत्रु उस पर विजय प्राप्त नहीं कर सकते, सब विद्वानों में प्रतिष्ठा प्राप्त करता और सब गुणी जनों में मान को प्राप्त होता है, इसलिये सब पुरुषों को उचित है कि नीचभावों के त्यागपूर्वक उच्चभावों का ग्रहण करें, ताकि परमपिता परमात्मा के निकटवर्ती हों ॥१३ ॥