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Rigveda / 8 / 3 / 2

भू॒याम॑ ते सुम॒तौ वा॒जिनो॑ व॒यं मा न॑: स्तर॒भिमा॑तये । अ॒स्माञ्चि॒त्राभि॑रवताद॒भिष्टि॑भि॒रा न॑: सु॒म्नेषु॑ यामय ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 3 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : मेध्यातिथिः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : सतःपङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय :

पदपाठ : भू॒याम॑ । ते॒ । सु॒ऽम॒तौ । वा॒जिनः॑ । व॒यम् । मा । नः॒ । स्तः॒ । अ॒भिऽमा॑तये । अ॒स्मान् । चि॒त्राभिः॑ । अ॒व॒ता॒त् । अ॒भिष्टि॑ऽभिः । आ । नः॒ । सु॒म्नेषु॑ । य॒म॒य॒ ॥ ८.३.२

पदार्थ : (वयं) हम लोग (वाजिनः) धनवान् होकर (ते, सुमतौ) आपकी सुबुद्धि में (भूयाम) वर्तमान हों (अभिमातये) अभिमानी शत्रु के लिये (नः) हमको (मा) मत (स्तः) हिंसित करें (चित्राभिः, अभिष्टिभिः) अनेक अभिलाषाओं से (अस्मान्, अवतात्) हमको सुरक्षित करके (नः) हमको (सुम्नेषु) सुखों में (आ, यमय) सम्बद्ध करें ॥२॥

भावार्थ : हे कर्मयोगी भगवन् ! आप ऐसी कृपा करें कि हम लोग ऐश्वर्य्यसम्पन्न होकर आपके सदृश उत्तम कर्मों में प्रवृत्त हों, हम अभिमानी शत्रुओं के पादाक्रान्त न हों, हे प्रभो ! आप हमारी कामनाओं को पूर्ण करें, जिससे हम सुखसम्पन्न होकर सदैव परमात्मा की आज्ञापालन में प्रवृत्त रहें ॥२ ॥