Rigveda / 8 / 3 / 3
इ॒मा उ॑ त्वा पुरूवसो॒ गिरो॑ वर्धन्तु॒ या मम॑ । पा॒व॒कव॑र्णा॒: शुच॑यो विप॒श्चितो॒ऽभि स्तोमै॑रनूषत ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 3 | Mantra No : 3
In English:
Seer : medhyaatithiH kaaNvaH | Devta : indra: | Metre : nichRRidbRRihatii | Tone : madhyamaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : imaa u tvaa puruuvaso giro vardhantu yaa mama . paavakavarNaaH shuchayo vipashchito.abhi stomairanuuShata .
Component Words : imaaH . uu.N iti . tvaa . puruvaso iti puru.avaso . giraH . vardhantu . yaaH . mama . paavaka.avarNaaH . shuchayaH . vipaH.achitaH . abhi . stomaiH . anuuShata . 8.3.3
In Hindi:
ऋषि : मेध्यातिथिः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृद्बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : अब कर्मयोगी का यशकीर्तन कथन करते हैं।
पदपाठ : इ॒माः । ऊँ॒ इति॑ । त्वा॒ । पु॒रु॒व॒सो॒ इति॑ पुरुऽवसो । गिरः॑ । व॒र्ध॒न्तु॒ । याः । मम॑ । पा॒व॒कऽव॑र्णाः । शुच॑यः । वि॒पः॒ऽचितः॑ । अ॒भि । स्तोमैः॑ । अ॒नू॒ष॒त॒ ॥ ८.३.३
पदार्थ : (पुरूवसो) हे अनेकविध ऐश्वर्य्यसम्पन्न ! (इमाः, याः, मम, गिरः) ये जो मेरी आशीर्विषयक वाणियें हैं, वे (त्वा, वर्धन्तु) आपको बढ़ाएँ (पावकवर्णाः) अग्निसमान वर्णवाले (शुचयः) शुद्ध (विपश्चितः) विद्वान् पुरुष (स्तोमैः) यज्ञ द्वारा (अभि, अनूषत) आपकी कीर्ति कथन करते हैं ॥३॥
भावार्थ : हे ऐश्वर्य्यसम्पन्न कर्मयोगिन् ! हम लोग शुभ वाणियों द्वारा आपको आशीर्वाद देते हैं कि परमेश्वर आपको अधिकाधिक ऐश्वर्य्यसम्पन्न करें । अग्निसमान तेजस्वी सब विद्वान् यज्ञों में आपके यश का गायन करते हैं कि परमात्मा आपको अधिक बढ़ावें और आप हम लोगों की वृद्धि करें ॥३ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : मेध्यातिथिः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृद्बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय : अथ कर्मयोगिनो यशो वर्ण्यते।
पदपाठ : इ॒माः । ऊँ॒ इति॑ । त्वा॒ । पु॒रु॒व॒सो॒ इति॑ पुरुऽवसो । गिरः॑ । व॒र्ध॒न्तु॒ । याः । मम॑ । पा॒व॒कऽव॑र्णाः । शुच॑यः । वि॒पः॒ऽचितः॑ । अ॒भि । स्तोमैः॑ । अ॒नू॒ष॒त॒ ॥ ८.३.३
भावार्थ :