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Rigveda / 8 / 5 / 5

मंहि॑ष्ठा वाज॒सात॑मे॒षय॑न्ता शु॒भस्पती॑ । गन्ता॑रा दा॒शुषो॑ गृ॒हम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 5 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मातिथिः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : मंहि॑ष्ठा । वा॒ज॒ऽसात॑मा । इ॒षय॑न्ता । शु॒भः । पती॒ इति॑ । गन्ता॑रा । दा॒शुषः॑ । गृ॒हम् ॥ ८.५.५

पदार्थ : (मंहिष्ठा) पूजनीयतम (वाजसातमा) अत्यन्त बल तथा अन्न के देनेवाले (इषयन्ता) अपने में प्रीति उत्पन्न करनेवाले (शुभस्पती) शोभन ऐश्वर्य्य के स्वामी (दाशुषः) यज्ञकर्ता के (गृहम्) गृह को (गन्तारा) जानेवाले उन दोनों की हम स्तुति करते हैं ॥५॥

भावार्थ : हे कर्मयोगी तथा ज्ञानयोगिन् ! आप विद्यादि गुणों के कारण सबके पूजनीय=सत्कारार्ह हो । आप अन्न के दाता, सर्वमित्र, सम्पूर्ण ऐश्वर्य्यों के स्वामी और याज्ञिक पुरुषों में प्रीति उत्पन्न करनेवाले हैं, इसलिये हम लोग आपकी स्तुति करते हैं । कृपा करके हमें भी उक्तगुणसम्पन्न करें ॥५ ॥