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Rigveda / 8 / 5 / 6

ता सु॑दे॒वाय॑ दा॒शुषे॑ सुमे॒धामवि॑तारिणीम् । घृ॒तैर्गव्यू॑तिमुक्षतम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 5 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मातिथिः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अब सदाचारवर्धक कर्मों के लिये प्रार्थना करना कथन करते हैं।

पदपाठ : ता । सु॒ऽदे॒वाय॑ । दा॒शुषे॑ । सु॒ऽमे॒धाम् । अवि॑ऽतारिणीम् । घृ॒तैः । गव्यू॑तिम् । उ॒क्ष॒त॒म् ॥ ८.५.६

पदार्थ : (ता) वे (सुदेवाय) शोभन देवों सहित (दाशुषे) यजमान के लिये (सुमेधाम्) सुन्दर संगतिवाली (अवितारिणीम्) आत्मा की वञ्चना न करनेवाली (गव्यूतिम्) इन्द्रियविषयभूतस्थली को (घृतैः) स्नेह से (उक्षतम्) सिञ्चित करें ॥६॥

भावार्थ : इस मन्त्र में याज्ञिक विद्वानों की ओर से यह प्रार्थना कथन की गई है कि हे कर्मयोगिन् ! आप हमारे यजमान की आत्मा को उच्च बनावें अर्थात् उन पर सदा प्रेम की दृष्टि रखें, जिससे वे अपनी इन्द्रियों को वशीभूत रखते हुए सदाचार में प्रवृत्त रहें, जिससे उनके यज्ञसम्बन्धी कार्य्य निर्विघ्न पूर्ण हों ॥६ ॥