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Rigveda / 8 / 5 / 8

येभि॑स्ति॒स्रः प॑रा॒वतो॑ दि॒वो विश्वा॑नि रोच॒ना । त्रीँर॒क्तून्प॑रि॒दीय॑थः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 5 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मातिथिः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अब कर्मयोगी तथा ज्ञानयोगी के यान का वैलक्षण्य कथन करते हैं।

पदपाठ : येभिः॑ । ति॒स्रः । प॒रा॒ऽवतः॑ । दि॒वः । विश्वा॑नि । रो॒च॒ना । त्रीन् । अ॒क्तून् । प॒रि॒ऽदीय॑थः ॥ ८.५.८

पदार्थ : (येभिः) जिन वाहनों द्वारा (तिस्रः, दिवः) तीन दिन और (त्रीन्, अक्तून्) तीन रात्रि में (परावतः) दूर-दूर के (विश्वानि, रोचना) सर्व दिव्यप्रदेशों में (परिदीयथः) प्राप्त करते हैं ॥८॥

भावार्थ : इस मन्त्र में ज्ञानयोगी तथा कर्मयोगी के यान का वैलक्षण्य वर्णन किया गया है कि वह अपने शीघ्रगामी यान द्वारा तीन दिन और तीन रात्रि में सम्पूर्ण दिव्यप्रदेशों=देश-देशान्तरों में परिभ्रमण करके अपनी राजधानी को प्राप्त करते हैं ॥८ ॥