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Rigveda / 8 / 8 / 11

अत॑: स॒हस्र॑निर्णिजा॒ रथे॒ना या॑तमश्विना । व॒त्सो वां॒ मधु॑म॒द्वचोऽशं॑सीत्का॒व्यः क॒विः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 8 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : सध्वंशः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : विराडार्ष्यनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय :

पदपाठ : अतः॑ । स॒हस्र॑ऽनिर्निजा । रथे॑न । आ । या॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ । व॒त्सः । वा॒म् । मधु॑ऽमत् । वचः॑ । अशं॑सीत् । का॒व्यः । क॒विः ॥ ८.८.११

पदार्थ : (अतः) इस हेतु (अश्विना) हे सेनाध्यक्ष तथा सभाध्यक्ष ! (सहस्रनिर्णिजा) अनेक रूपोंवाले (रथेन) रथद्वारा (आयातम्) आप आएँ (वत्सः) आपका वत्स (काव्यः) कविपुत्र (कविः) स्वयं भी कवि यह उपासक (वाम्) आपकी स्तुतिसम्बन्धी (मधुमद्वचः) मधुरवाणियों को (अशंसीत्) कर रहा है ॥११॥

भावार्थ : हे सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष ! आप अपने विचित्र यान द्वारा हमारे यज्ञ को प्राप्त हों, सब विद्वान् पुरुष मधुर वाणियों द्वारा आपका स्तवन कर रहे हैं ॥११ ॥