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Rigveda / 8 / 8 / 12

पु॒रु॒म॒न्द्रा पु॑रू॒वसू॑ मनो॒तरा॑ रयी॒णाम् । स्तोमं॑ मे अ॒श्विना॑वि॒मम॒भि वह्नी॑ अनूषाताम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 8 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : सध्वंशः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय :

पदपाठ : पु॒रु॒ऽम॒न्द्रा । पु॒रु॒वसू॒ इति॑ पु॒रु॒ऽवसू॑ । म॒नो॒तरा॑ । र॒यी॒णाम् । स्तोम॑म् । मे॒ । अ॒श्विनौ॑ । इ॒मम् । अ॒भि । वह्नी॒ इति॑ । अ॒नू॒षा॒ता॒म् ॥ ८.८.१२

पदार्थ : (पुरुमन्द्रा) हे अति आनन्दवाले (पुरूवसू) अति धनवाले (रयीणाम्) धनों के (मनोतरा) अत्यन्त ज्ञानवाले (अश्विनौ) व्यापक शक्तिवाले (वह्नी) जगत् के वोढा ! आप (इमं, मे, स्तोमम्) इस मेरे स्तोत्र को (अभ्यनूषाताम्) प्रशंसनीय करें ॥१२॥

भावार्थ : हे सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष ! आप आनन्दयुक्त, बहुधनों के स्वामी तथा धनोपार्जन की विद्या जाननेवाले, सर्वपूज्य=सत्कारार्ह हैं, हे भगवन् ! हमारे इस स्तुतिप्रद वाक्यों को श्रवण करते हुए हमारे यज्ञ में आकर इसको सफलीभूत करें ॥१२ ॥