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Rigveda / 8 / 8 / 17

आ नो॑ गन्तं रिशादसे॒मं स्तोमं॑ पुरुभुजा । कृ॒तं न॑: सु॒श्रियो॑ नरे॒मा दा॑तम॒भिष्ट॑ये ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 8 | Mantra No : 17

In Hindi:

ऋषि : सध्वंशः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : विराडार्ष्यनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय :

पदपाठ : आ । नः॒ । ग॒न्त॒म् । रि॒शा॒द॒सा॒ । इ॒मम् । स्तोम॑म् । पु॒रु॒ऽभु॒जा॒ । कृ॒तम् । नः॒ । सु॒ऽश्रियः॑ । न॒रा॒ । इ॒मा । दा॒त॒म् । अ॒भिष्ट॑ये ॥ ८.८.१७

पदार्थ : (रिशादसा) हे शत्रुओं को भगानेवाले (पुरुभुजा) बहुत रत्नों के भोक्ता (नरा) नेता ! आप (इमम्) इस (नः, स्तोमम्) हमारे स्तोत्र के (आ) अभिमुख (गन्तम्) आवें (नः) हमको (सुश्रियः) शोभनश्रीयुक्त (कृतम्) करें (अभिष्टये) यज्ञ के अर्थ (इमा) इन भौतिक पदार्थों को (दातम्) दें ॥१७॥

भावार्थ : हे शत्रुओं पर विजय प्राप्त करनेवाले सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष ! आप हमारे यज्ञ के पूर्त्यर्थ उत्तमोत्तम पदार्थ प्रदान करते हुए हमारे यज्ञ को प्राप्त होकर हमें उत्साहित करें ॥१७ ॥