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Rigveda / 8 / 8 / 18

आ वां॒ विश्वा॑भिरू॒तिभि॑: प्रि॒यमे॑धा अहूषत । राज॑न्तावध्व॒राणा॒मश्वि॑ना॒ याम॑हूतिषु ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 8 | Mantra No : 18

In Hindi:

ऋषि : सध्वंशः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय :

पदपाठ : आ । वा॒म् । विश्वा॑भिः । ऊ॒तिऽभिः॑ । प्रि॒यऽमे॑धाः । अ॒हू॒ष॒त॒ । राज॑न्तौ । अ॒ध्व॒राणा॑म् । अश्वि॑ना । याम॑ऽहूतिषु ॥ ८.८.१८

पदार्थ : (अध्वराणाम्, राजन्तौ) हे हिंसारहित यज्ञादि कर्मों के स्वामी (अश्विना) सेनाध्यक्ष तथा सभाध्यक्ष (विश्वाभिः, ऊतिभिः) सब प्रकार की रक्षाओं के सहित ! (वाम्) आपको (प्रियमेधाः) यज्ञप्रिय मनुष्य (यामहूतिषु) यज्ञों में (आहूषत) आह्वान करते हैं ॥१८॥

भावार्थ : हे यज्ञादि कर्मों के नेता सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष ! आप हमारे यज्ञ को प्राप्त होकर हमारी सब ओर से रक्षा करें, ताकि हमारा यज्ञ निर्विघ्न पूर्ण हो ॥१८ ॥