Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 152 / 6

आ धे॒नवो॑ मामते॒यमव॑न्तीर्ब्रह्म॒प्रियं॑ पीपय॒न्त्सस्मि॒न्नूध॑न्। पि॒त्वो भि॑क्षेत व॒युना॑नि वि॒द्वाना॒साविवा॑स॒न्नदि॑तिमुरुष्येत् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 152 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : मित्रावरुणौ | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।

पदपाठ : आ। धे॒नवः॑। मा॒म॒ते॒यम्। अव॑न्तीः। ब्र॒ह्म॒ऽप्रिय॑म्। पी॒प॒य॒न्। सस्मि॑न्। ऊध॑न्। पि॒त्वः। भि॒क्षे॒त॒। व॒युना॑नि। वि॒द्वान्। आ॒सा। आ॒ऽविवा॑सन्। अदि॑तिम्। उ॒रु॒ष्ये॒त् ॥ १.१५२.६

पदार्थ : जैसे (धेनवः) धेनु गौयें (सस्मिन्) अपने (ऊधन्) ऐन में हुए दूध से बछड़ों को पुष्ट करती हैं वैसे जो स्त्री (ब्रह्मप्रियम्) वेदाध्ययन जिसको प्रिय उस (मामतेयम्) ममत्व से माने हुए अपने पुत्र की (अवन्तीः) रक्षा करती हुई (आ, पीपयन्) उसकी वृद्धि उन्नति करती हैं वा जैसे (विद्वान्) विद्यावान् जन (आसा) मुख से (पित्वः) अन्न की (भिक्षेत) याचना करे और (अदितिम्) न नष्ट होनेवाली विद्या का (आविवासन्) सब ओर से सेवन करता हुआ (वयुनानि) उत्तम ज्ञानों को (उरुष्येत्) सेवे वैसे पढ़ानेवाले पुरुष औरों को विद्या और सिखावट का ग्रहण करावें ॥ ६ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे माता जन अपने लड़कों को दूध आदि के देने से बढ़ाती हैं, वैसे विदुषी स्त्री और विद्वान् पुरुष कुमार और कुमारियों को विद्या और अच्छी शिक्षा से बढ़ावें, उन्नतियुक्त करें ॥ ६ ॥