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Rigveda / 1 / 152 / 7

आ वां॑ मित्रावरुणा ह॒व्यजु॑ष्टिं॒ नम॑सा देवा॒वव॑सा ववृत्याम्। अ॒स्माकं॒ ब्रह्म॒ पृत॑नासु सह्या अ॒स्माकं॑ वृ॒ष्टिर्दि॒व्या सु॑पा॒रा ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 152 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : मित्रावरुणौ | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।

पदपाठ : आ। वा॒म्। मि॒त्रा॒व॒रु॒णा॒। ह॒व्यऽजु॑ष्टिम्। नम॑सा। देवौ॑। अव॑सा। व॒वृ॒त्या॒म्। अ॒स्माक॑म्। ब्रह्म॑। पृत॑नासु। स॒ह्याः॒। अ॒स्माक॑म्। वृ॒ष्टिः। दि॒व्या। सु॒ऽपा॒रा ॥ १.१५२.७

पदार्थ : हे (देवौ) दिव्य स्वभाववाले (मित्रावरुणा) मित्र और उत्तम जन ! जैसे मैं (वाम्) तुम दोनों की (नमसा) अन्न से (हव्यजुष्टिम्) ग्रहण करने योग्य सेवा को (आ, ववृत्याम्) अच्छे प्रकार वर्त्तूं वैसे तुम दोनों (अवसा) रक्षा आदि काम से (अस्माकम्) हमारे (पृतनासु) मनुष्यों में (ब्रह्म) धन की वृद्धि कराइये। हे विद्वान् ! जो (अस्माकम्) हमारी (दिव्या) शुद्ध (सुपारा) जिससे कि सुख के साथ सब कामों की परिपूर्णता हो ऐसी (वृष्टिः) दुष्टों की शक्ति बाँधनेवाली शक्ति है, उसको (सह्याः) सहो ॥ ७ ॥

भावार्थ : जैसे विद्वान् जन अति प्रीति से हमारे लिये विद्याओं को देवें वैसे हम लोग इनको अत्यन्त श्रद्धा से सेवें, जिससे हमारी शुद्ध प्रशंसा सर्वत्र विदित हो ॥ ७ ॥