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Rigveda / 8 / 19 / 8

प्र॒शंस॑मानो॒ अति॑थि॒र्न मि॒त्रियो॒ऽग्नी रथो॒ न वेद्य॑: । त्वे क्षेमा॑सो॒ अपि॑ सन्ति सा॒धव॒स्त्वं राजा॑ रयी॒णाम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 19 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : सोभरिः काण्वः | देवता : अग्निः | छन्द : भुरिगार्चीपङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय :

पदपाठ : प्र॒ऽशंस॑मानः । अति॑थिः । न । मि॒त्रियः॑ । अ॒ग्निः । रथः॑ । न । वेद्यः॑ । त्वे॒ इति॑ । क्षेमा॑सः । अपि॑ । स॒न्ति॒ । सा॒धवः॑ । त्वम् । राजा॑ । र॒यी॒णाम् ॥ ८.१९.८

पदार्थ : (अग्निः) परमात्मा (अतिथिः, न) अतिथि के समान (प्रशंसमानः) प्रशंसनीय (मित्रियः) प्राणियों का हितकारक (रथः, न, वेद्यः) रथ के समान प्राप्तव्य है, हे परमात्मन् ! (त्वयि) आप में (साधवः, क्षेमासः) साधक मङ्गल (अपिसन्ति) निश्चय रहते हैं (त्वम्) आप (रयीणाम्) धनों के (राजा) स्वामी हैं ॥८॥

भावार्थ : अतिथि का सादृश्य देकर इस मन्त्र में यह व्यक्त किया है कि अतिथि को भी परमात्मा के समान पूज्य मानना चाहिये और रथ का साहाय्य इसलिये दिया है कि जैसे किसी यान्त्रिक को रथ का प्रयोजन प्रथम ही होता है, इसी प्रकार संसारयात्रा करनेवाले को रथरूप परमात्मा का आश्रय लेना परमावश्यक है, क्योंकि वह पूजनीय, सबका मित्र, मङ्गलमय और सब धनों का स्वामी है ॥८ ॥