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Rigveda / 8 / 19 / 9

सो अ॒द्धा दा॒श्व॑ध्व॒रोऽग्ने॒ मर्त॑: सुभग॒ स प्र॒शंस्य॑: । स धी॒भिर॑स्तु॒ सनि॑ता ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 19 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : सोभरिः काण्वः | देवता : अग्निः | छन्द : पादनिचृदुष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय :

पदपाठ : सः । अ॒द्धा । दा॒शुऽअ॑ध्वरः । अग्ने॑ । मर्तः॑ । सु॒ऽभ॒ग॒ । सः । प्र॒ऽशंस्यः॑ । सः । धी॒भिः । अ॒स्तु॒ । सनि॑ता ॥ ८.१९.९

पदार्थ : (सुभग, अग्ने) हे सुन्दर ऐश्वर्य्ययुक्त परमात्मन् ! जो (दाश्वध्वरः) आपके यज्ञ को सम्पादन करता है (सः, मर्तः) वह मनुष्य (अद्धा) सत्य का आश्रयण करनेवाला (सः, प्रशंस्यः) वही प्रशंसाप्राप्त (सः) वही (धीभिः) कर्मों द्वारा (सनिता) सब प्राणियों का उपकारक (अस्तु) हो ॥९॥

भावार्थ : परमात्मसम्बन्धी यज्ञ करनेवाले को मानस वा वाचिक सत्यता, पवित्र यश, शुभकर्मों द्वारा परोपकार शक्ति इत्यादि अनेक सद्गुण प्राप्त होते हैं अर्थात् जब उपासक जन विद्वानों से सम्मिलित होकर परमात्मयज्ञ करने में प्रवृत्त होते हैं, तब परमात्मा उन्हें ऐसी सद्बुद्धि तथा आत्मबल देता है, जिससे वे सत्य के आश्रित होकर शुभकर्मों द्वारा अनेक परोपकार करके उत्तम यश का लाभ करते हैं, अतएव प्रत्येक पुरुष को परमात्मसम्बन्धी यज्ञ करना चाहिये, ताकि वह यशस्वी और ऐश्वर्य्यशाली होकर उत्तम जीवनवाला हो ॥९ ॥