Rigveda / 9 / 9 / 5
ता अ॒भि सन्त॒मस्तृ॑तं म॒हे युवा॑न॒मा द॑धुः । इन्दु॑मिन्द्र॒ तव॑ व्र॒ते ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 9 | Mantra No : 5
In English:
Seer : asitaH kaashyapo devalo vaa | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : gaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : taa abhi santamastRRita.m mahe yuvaanamaa dadhuH . indumindra tava vrate .
Component Words : taaH . abhi . santam . astRRitam . mahe . yuvaanam . aa . dadhuH . indum . indra . tava . vrate . 9.9.5
In Hindi:
ऋषि : असितः काश्यपो देवलो वा | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय :
पदपाठ : ताः । अ॒भि । सन्त॑म् । अस्तृ॑तम् । म॒हे । युवा॑नम् । आ । द॒धुः॒ । इन्दु॑म् । इ॒न्द्र॒ । तव॑ । व्र॒ते ॥ ९.९.५
पदार्थ : (इन्द्र) हे परमैश्वर्यशालि परमात्मन् ! (तव, व्रते) तुम्हारे व्रत की पूर्ति के लिये (इन्दुम्) जीवात्मा को (युवानम्) जो नित्य नूतन है (सन्तम्) सत्कर्मी (अस्तृतम्) जो अच्छेद्य है, उसको (ताः) वे (अभि) भली-भाँति योगजबुद्धिवृत्तियें (महे) महत्त्व की प्राप्ति के लिये (आदधुः) धारण करती हैं ॥५॥
भावार्थ : कर्मयोगी पुरुष अपने निष्काम कर्म द्वारा उस तत्त्व को प्राप्त होता है, जिसको योग में एकतत्त्वाभ्यास लिखा है अर्थात् उस तत्त्व की प्राप्ति के लिये कर्मयोगी होना आवश्यक है ॥५॥३२॥
In Sanskrit:
ऋषि : असितः काश्यपो देवलो वा | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
पदपाठ : ताः । अ॒भि । सन्त॑म् । अस्तृ॑तम् । म॒हे । युवा॑नम् । आ । द॒धुः॒ । इन्दु॑म् । इ॒न्द्र॒ । तव॑ । व्र॒ते ॥ ९.९.५
भावार्थ :