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Rigveda / 9 / 9 / 4

स स॒प्त धी॒तिभि॑र्हि॒तो न॒द्यो॑ अजिन्वद॒द्रुह॑: । या एक॒मक्षि॑ वावृ॒धुः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 9 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : असितः काश्यपो देवलो वा | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : सः । स॒प्त । धी॒तिऽभिः॑ । हि॒तः । न॒द्यः॑ । अ॒जि॒न्व॒त् । अ॒द्रुहः॑ । याः । एक॑म् । अक्षि॑ । व॒वृ॒धुः ॥ ९.९.४

पदार्थ : (सः) वह परमात्मा (सप्त, नद्यः) इडा, पिङ्गलादि सात नाड़ियों को “नदन्तीति नद्यः” (धीतिभिः) ‘धीयते सर्वकर्मसु इति धीतिर्बुद्धिः’ जब बुद्धि की वृत्तियों से (हितः) धारण किया जाता है, तो (अजिन्वत्) योग द्वारा तृप्त करता है (याः, अद्रुहः) जो नाड़ियें स्वकर्तव्य पालन करती हुयी (एकम्, अक्षि) उस एक अविनाशी परमात्मा को (वावृधुः) प्रकाशित करती हैं ॥४॥

भावार्थ : इस मन्त्र में योगविद्या का वर्णन किया गया है, भाव यह है कि जब पुरुष अपने प्राणायाम द्वारा इडा पिङ्गलादि नाडियों को तृप्त कर देता है, तो वह उस अभ्यास से एकाग्रचित्त होकर अविनाशी परमात्मा के भाव को अनुभव करता है ॥४॥