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Rigveda / 9 / 61 / 11

ए॒ना विश्वा॑न्य॒र्य आ द्यु॒म्नानि॒ मानु॑षाणाम् । सिषा॑सन्तो वनामहे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 61 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : अमहीयुः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : विराड्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : ए॒ना । विश्वा॑नि । अ॒र्यः । आ । द्यु॒म्नानि॑ । मानु॑षाणाम् । सिसा॑सन्तः । व॒ना॒म॒हे॒ ॥ ९.६१.११

पदार्थ : (अर्यः) प्रजाओं का स्वामी (एना) अपनी क्रियाओं से (मानुषाणाम्) मनुष्यों की (विश्वा द्युम्नानि) सम्पूर्ण सम्पत्तियों का (आ) आहरण अर्थात् संचय करता है (सिषासन्तः) ऐसे स्वामी की भक्ति में तत्पर रहते हुए हम (वनामहे) उसकी प्रार्थना करते हैं ॥११॥

भावार्थ : इस मन्त्र में स्वामिभक्ति का वर्णन किया गया है। तात्पर्य्य यह है कि स्वामिभक्ति से पुरुष उच्च पदवी को प्राप्त होता है ॥११॥