Rigveda / 9 / 61 / 10
उ॒च्चा ते॑ जा॒तमन्ध॑सो दि॒वि षद्भूम्या द॑दे । उ॒ग्रं शर्म॒ महि॒ श्रव॑: ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 61 | Mantra No : 10
In English:
Seer : amahiiyuH | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : nichRRidgaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : uchchaa te jaatamandhaso divi Shadbhuumyaa dade . ugra.m sharma mahi shravaH .
Component Words : uchchaa . te . jaatam . andhasaH . divi . sat . bhuumiH . aa . dade . ugram . sharma . mahi . shravaH . 9.61.10
In Hindi:
ऋषि : अमहीयुः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय :
पदपाठ : उ॒च्चा । ते॒ । जा॒तम् । अन्ध॑सः । दि॒वि । सत् । भूमिः॑ । आ । द॒दे॒ । उ॒ग्रम् । शर्म॑ । महि॑ । श्रवः॑ ॥ ९.६१.१०
पदार्थ : (ते अन्धसः) हे कर्मयोगिन् ! तुम्हारे पैदा किये हुए पदार्थों के (उच्चा जातम्) उच्च समूह को (भूमिः आददे) सम्पूर्ण पृथिवी भर के लोग ग्रहण करते हैं (उग्रम् शर्म) जो कि अत्यन्त सुखस्वरूप हैं तथा (महि श्रवः) आपका महत् यश (दिविषत्) द्युलोक में भी व्याप्त है ॥१०॥
भावार्थ : कर्म्मयोगी पुरुष के उत्पन्न किये हुए कलाकौशल से सम्पूर्ण लोग लाभ उठाते हैं ॥१०॥
In Sanskrit:
ऋषि : अमहीयुः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
पदपाठ : उ॒च्चा । ते॒ । जा॒तम् । अन्ध॑सः । दि॒वि । सत् । भूमिः॑ । आ । द॒दे॒ । उ॒ग्रम् । शर्म॑ । महि॑ । श्रवः॑ ॥ ९.६१.१०
भावार्थ :