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Rigveda / 9 / 66 / 15

आ प॑वस्व॒ गवि॑ष्टये म॒हे सो॑म नृ॒चक्ष॑से । एन्द्र॑स्य ज॒ठरे॑ विश ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 66 | Mantra No : 15

In Hindi:

ऋषि : शतं वैखानसाः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : आ । पा॒व॒स्व॒ । गोऽइ॑ष्टये । म॒हे । सो॒म॒ । नृ॒ऽचक्ष॑से । आ । इन्द्र॑स्य । ज॒ठरे॑ । वि॒श॒ ॥ ९.६६.१५

पदार्थ : (सोम) हे परमात्मन् ! आप (आपवस्व) हमको सब ओर से पवित्र करें (महे) बड़े (नृचक्षसे) ज्ञानकी वृद्धि के लिए और (गविष्टये) इन्द्रियों की शुद्धि के लिए और (इन्द्रस्य) कर्मयोगी के (जठरे) जठराग्नि में (आविश) प्रवेश करें ॥१५॥

भावार्थ : परमात्मा उपदेश करता है कि मैं कर्मयोगी तथा ज्ञानयोगियों के हृदय में अवश्यमेव निवास करता हूँ। यद्यपि परमात्मा सर्वत्र है, तथापि परमात्मा की अभिव्यक्ति जैसी ज्ञानयोगी तथा कर्मयोगी के हृदय में होती है, वैसी अन्यत्र नहीं होती। इसी अभिप्राय से यहाँ कर्मयोगी के हृदय में विराजमान होना लिखा गया है और “वैश्वानरस्तद्धर्मव्यपदेशात्” इस सूत्र में परमात्मा को “वैश्वानर” अग्निरूप से कथन किया गया है ॥