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Rigveda / 9 / 66 / 16

म॒हाँ अ॑सि सोम॒ ज्येष्ठ॑ उ॒ग्राणा॑मिन्द॒ ओजि॑ष्ठः । युध्वा॒ सञ्छश्व॑ज्जिगेथ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 66 | Mantra No : 16

In Hindi:

ऋषि : शतं वैखानसाः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : म॒हान् । अ॒सि॒ । सो॒म॒ । ज्येष्ठः॑ । उ॒ग्राणा॑म् । इ॒न्दो॒ इति॑ । ओजि॑ष्ठः । युध्वा॑ । सन् । शश्व॑त् । जि॒गे॒थ॒ ॥ ९.६६.१६

पदार्थ : (सोम) हे परमात्मन् ! आप (महानसि) बड़े हैं और (उग्राणाम्) तेजस्वियों में (ज्येष्ठः) बड़े हैं। (इन्दो) हे सर्वप्रकाशक परमात्मन् ! आप (ओजिष्ठः) सर्वोपरि ओजस्वी हैं और आप (युध्वा सन्) अपने से प्रतिकूल शक्तियों से युद्ध करते हुए (शश्वत्) निरन्तर (जिगेथ) जीतते हैं ॥१६॥

भावार्थ : परमात्मा सूर्य-चन्द्रमादिकों की रचना करता हुआ अर्थात् उत्पत्तिसमय में विनाशरूपी सब विरोधी शक्तियों को जीतता है। इस प्रकार परमात्मा सर्वविजयी कथन किया गया है, किसी युद्धविशेष के अभिप्राय से नहीं ॥१६॥