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Rigveda / 9 / 69 / 8

आ न॑: पवस्व॒ वसु॑म॒द्धिर॑ण्यव॒दश्वा॑व॒द्गोम॒द्यव॑मत्सु॒वीर्य॑म् । यू॒यं हि सो॑म पि॒तरो॒ मम॒ स्थन॑ दि॒वो मू॒र्धान॒: प्रस्थि॑ता वय॒स्कृत॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 69 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : हिरण्यस्तूपः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : आ । नः॒ । प॒व॒स्व॒ । वसु॑ऽमत् । हिर॑ण्यऽवत् । अश्व॑ऽवत् । गोऽम॑त् । यव॑ऽमत् । सु॒ऽवीर्य॑म् । यू॒यम् । हि । सो॒म॒ । पि॒तरः॑ । मम॑ । स्थन॑ । दि॒वः । मू॒र्धानः॑ । प्रऽस्थि॑ताः । व॒यः॒ऽकृतः॑ ॥ ९.६९.८

पदार्थ : (सोम) हे परमात्मन् ! (वसुमत्) ऐश्वर्यसंपन्न (हिरण्यवत्) स्वर्णादि धन के स्वामी (गोमत्) गवाद्यैश्वर्यवाले (अश्ववत्) विद्युदादि शक्तियों के स्वामी (यवमत्) अन्नधनाद्यैश्वर्ययुक्त आप (सुवीर्यं) सुन्दर पराक्रम को (नः) हम लोगों को (आ पवस्व) सब ओर से दें। (यूयम्) आप (हि) निश्चय करके (मम) मेरे (पितरः स्थन) पालन करनेवाले हैं और (वयस्कृतः) ऐश्वर्य के देनेवाले आप (दिवः) द्युलोक के (मूर्धानः) मुखरूप (प्रस्थिताः) विराजमान हैं ॥८॥

भावार्थ : इस मन्त्र में परमात्मा से ऐश्वर्य की प्रार्थना की गई है ॥८॥