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Rigveda / 9 / 69 / 9

ए॒ते सोमा॒: पव॑मानास॒ इन्द्रं॒ रथा॑ इव॒ प्र य॑युः सा॒तिमच्छ॑ । सु॒ताः प॒वित्र॒मति॑ य॒न्त्यव्यं॑ हि॒त्वी व॒व्रिं ह॒रितो॑ वृ॒ष्टिमच्छ॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 69 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : हिरण्यस्तूपः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : ए॒ते । सोमाः॑ । पव॑मानासः । इन्द्र॑म् । रथाः॑ऽइव । प्र । य॒युः॒ । सा॒तिम् । अच्छ॑ । सु॒ताः । प॒वित्र॑म् । अति॑ । य॒न्ति॒ । अव्य॑म् । हि॒त्वी । व॒व्रिम् । ह॒रितः॑ । वृ॒ष्टिम् । अच्छ॑ ॥ ९.६९.९

पदार्थ : (पवमानासः) पवित्र करनेवाले (एते) ये (सुताः) संस्कृत (सोमाः) सौम्य स्वाभाव व (रथा इव) संग्राम में महारथी के समान (पवित्रं) पवित्र (सातिं अच्छ) संग्राम के अभिमुख जानेवाले (इन्द्रं) कर्मयोगी को (प्रययुः) प्राप्त हों। उक्त स्वभाव (हरितः) पापों को हरण करते हुए (अव्यं) कायरता को (अति यन्ति) दूर करते हैं और (वव्रिं) जरा का (हित्वी) नाश करके (वृष्टिम्) आनन्द की वृष्टि को (अच्छ) देते हैं ॥९॥

भावार्थ : इस मन्त्र में शील की प्रार्थना है, जिस शुभ शील से मनुष्य ऐश्वर्यसंपन्न होता है ॥९॥