Rigveda / 9 / 77 / 3
ते न॒: पूर्वा॑स॒ उप॑रास॒ इन्द॑वो म॒हे वाजा॑य धन्वन्तु॒ गोम॑ते । ई॒क्षे॒ण्या॑सो अ॒ह्यो॒३॒॑ न चार॑वो॒ ब्रह्म॑ब्रह्म॒ ये जु॑जु॒षुर्ह॒विर्ह॑विः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 77 | Mantra No : 3
In English:
Seer : kaviH | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : paadanichRRijjgatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : te naH puurvaasa uparaasa indavo mahe vaajaaya dhanvantu gomate . iikSheNyaaso ahyo3 na chaaravo brahmabrahma ye jujuShurhavirhaviH .
Component Words : te . naH . puurvaasaH . uparaasaH . indavaH . mahe . vaajaaya . dhanvantu . go.amate . iikSheNyaasaH . ahyaH . na . chaaravaH . brahma.abrahma . ye . jujuShuH . haviH.ahaviH . 9.77.3
In Hindi:
ऋषि : कविः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : पादनिचृज्ज्गती | स्वर : निषादः
विषय :
पदपाठ : ते । नः॒ । पूर्वा॑सः । उप॑रासः । इन्द॑वः । म॒हे । वाजा॑य । ध॒न्व॒न्तु॒ । गोऽम॑ते । ई॒क्षे॒ण्या॑सः । अ॒ह्यः॑ । न । चार॑वः । ब्रह्म॑ऽब्रह्म । ये । जु॒जु॒षुः । ह॒विःऽह॑विः ॥ ९.७७.३
पदार्थ : (ते) पूर्वोक्त विद्वान् (नः) जो हमारे (पूर्वासः) पूर्वज (उपरासः) और जो भविष्य में होनेवाले हैं, (इन्दवः) वे ज्ञानी (महे गोमते) बड़े ज्ञान के लिये और (वाजाय) बल के लिये (धन्वन्तु) उस परमात्मा को प्राप्त हों और (ये) जो (ब्रह्म ब्रह्म) ब्रह्मप्राप्ति के लिये और (हविर्हविः) हवि के लिए (जुजुषुः) सेवन करते हैं, वे (चारवो न) श्रेष्ठ लोगों के समान (अह्यः) सुन्दर और (ईक्षेण्यासः) दर्शनीय होते हैं ॥३॥
भावार्थ : प्राचीन और अर्वाचीन अर्थात् पुराने और नये दोनों प्रकार के विद्वान् जो वेद को ईश्वर प्राप्ति के लिये पढ़ते हैं और हवनादि यज्ञों को कर्म्मकाण्ड के लिये करते हैं, वे इस संसार में दर्शनीय और सदाचार फैलाने के हेतु होते हैं, अन्य नहीं ॥३॥
In Sanskrit:
ऋषि : कविः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : पादनिचृज्ज्गती | स्वर : निषादः
पदपाठ : ते । नः॒ । पूर्वा॑सः । उप॑रासः । इन्द॑वः । म॒हे । वाजा॑य । ध॒न्व॒न्तु॒ । गोऽम॑ते । ई॒क्षे॒ण्या॑सः । अ॒ह्यः॑ । न । चार॑वः । ब्रह्म॑ऽब्रह्म । ये । जु॒जु॒षुः । ह॒विःऽह॑विः ॥ ९.७७.३
भावार्थ :