Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 9 / 77 / 4

अ॒यं नो॑ वि॒द्वान्व॑नवद्वनुष्य॒त इन्दु॑: स॒त्राचा॒ मन॑सा पुरुष्टु॒तः । इ॒नस्य॒ यः सद॑ने॒ गर्भ॑माद॒धे गवा॑मुरु॒ब्जम॒भ्यर्ष॑ति व्र॒जम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 77 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : कविः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : अ॒यम् । नः॒ । वि॒द्वान् । व॒न॒व॒त् । व॒नु॒ष्य॒तः । इन्दुः॑ । स॒त्राचा॑ । मन॑सा । पु॒रु॒ऽस्तु॒तः । इ॒नस्य॑ । यः । सद॑ने । गर्भ॑म् । आ॒ऽद॒धे । गवा॑म् । उ॒रु॒ब्जम् । अ॒भि । अर्ष॑ति । व्र॒जम् ॥ ९.७७.४

पदार्थ : (अयम्) यह जो (नः) हमारे मध्य में (विद्वान्) विद्वान् है, वह (वनुष्यतः) हमारे शत्रुओं को (सत्राचा मनसा) समाहित मन से (वनवत्) नाश कर सकता है और वह परमात्मा (इन्दुः) प्रकाशस्वरूप है (पुरुष्टुतः) तथा माननीय है। (यः) जो पुरुष (इनस्य) ईश्वर की (सदने) सन्निधि में (गर्भम्) शिक्षा को (आदधे) धारण करता है, वह (गवाम्) इन्द्रियों के (व्रजम्) फल को (उरुब्जम्) जो सर्वोपरि है, उसको (अभ्यर्षति) प्राप्त होता है ॥४॥

भावार्थ : जो विद्वान् इश्वरीयज्ञान पर विश्वास करता है, वह मनुष्यजन्म के फल को प्राप्त करता है ॥४॥