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Rigveda / 9 / 86 / 32

स सूर्य॑स्य र॒श्मिभि॒: परि॑ व्यत॒ तन्तुं॑ तन्वा॒नस्त्रि॒वृतं॒ यथा॑ वि॒दे । नय॑न्नृ॒तस्य॑ प्र॒शिषो॒ नवी॑यसी॒: पति॒र्जनी॑ना॒मुप॑ याति निष्कृ॒तम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 86 | Mantra No : 32

In Hindi:

ऋषि : त्रयऋषिगणाः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : सः । सूर्य॑स्य । र॒श्मिऽभिः॑ । परि॑ । व्य॒त॒ । तन्तु॑म् । त॒न्वा॒नः । त्रि॒ऽवृत॑म् । यथा॑ । वि॒दे । नय॑न् । ऋ॒तस्य॑ । प्र॒ऽशिषः॑ । नवी॑यसीः । पतिः॑ । जनी॑नाम् । उप॑ । या॒ति॒ । निः॒ऽकृ॒तम् ॥ ९.८६.३२

पदार्थ : वह परमात्मा (यथाविदे) यथार्थ ज्ञानी के लिये (त्रिवृतं) तीन प्रकार के ब्रह्मचर्य्य को (तन्वानः) विस्तार करता हुआ (तन्तुं परिव्यत) सन्ततिरूप तन्तु का विस्तार करता है (सः) और वह परमात्मा (सूर्य्यस्य रश्मिभिः) सूर्य्य की किरणों द्वारा प्रकाश करता हुआ (ऋतस्य प्रशिषः) सच्चाई की प्रशंसा (नवीयसीः) जो कि नित्य नूतन है, उसको (नयन्) प्राप्त कराता हुआ (जनीनां) मनुष्यों के (निष्कृतं) संस्कृत अन्तःकरण को (उपयाति) प्राप्त होता है। (पतिः) वही परमात्मा इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का पति है ॥३२॥

भावार्थ : परमात्मा इस संसार में प्रथम, मध्यम, उत्तम तीन प्रकार के ब्रह्मचर्य्य की मर्यादा को निर्माण करता है। उन कृतब्रह्मचर्य्य पुरुषों से शुभ सन्तति का प्रवाह संसार में प्रचलित होता है ॥३२॥