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Rigveda / 9 / 86 / 33

राजा॒ सिन्धू॑नां पवते॒ पति॑र्दि॒व ऋ॒तस्य॑ याति प॒थिभि॒: कनि॑क्रदत् । स॒हस्र॑धार॒: परि॑ षिच्यते॒ हरि॑: पुना॒नो वाचं॑ ज॒नय॒न्नुपा॑वसुः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 86 | Mantra No : 33

In Hindi:

ऋषि : त्रयऋषिगणाः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : राजा॑ । सिन्धू॑नाम् । प॒व॒ते॒ । पतिः॑ । दि॒वः । ऋ॒तस्य॑ । या॒ति॒ । प॒थिऽभिः॑ । कनि॑क्रदत् । स॒हस्र॑ऽधारः । परि॑ । सि॒च्य॒ते॒ । हरिः॑ । पु॒ना॒नः । वाच॑म् । ज॒नय॑न् । उप॑ऽवसुः ॥ ९.८६.३३

पदार्थ : (हरिः) परमात्मा (पुनानः) सबको पवित्र करता हुआ (वाचं जनयन्) वेदरूपी वाणी को उत्पन्न करता हुआ (उपावसुः) सब धनों का आधार (परि सिच्यते) विद्वानों द्वारा उपासना किया जाता है। (सहस्रधारः) वह अनन्त शक्तिमान् है (सिन्धूनां राजा) और स्यन्दनशील सब पदार्थों का राजा है और (दिवः) द्युलोक का (पतिः) पति है। (ऋतस्य पथिभिः) सच्चाई की रास्तों से (कनिक्रदत्) वह शब्दायमान ब्रह्म (याति) अपने भक्तों की गति करता है तथा (पवते) उनको पवित्र करता है ॥३३॥

भावार्थ : परमात्मा अपनी वेदरूपी वाणी को उत्पन्न करके सदा उपदेश करता है। परमात्मानुयायी पुरुषों को चाहिये कि उसकी आज्ञानुसार अपना जीवन बनायें ॥३३॥