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Rigveda / 9 / 86 / 37

ई॒शा॒न इ॒मा भुव॑नानि॒ वीय॑से युजा॒न इ॑न्दो ह॒रित॑: सुप॒र्ण्य॑: । तास्ते॑ क्षरन्तु॒ मधु॑मद्घृ॒तं पय॒स्तव॑ व्र॒ते सो॑म तिष्ठन्तु कृ॒ष्टय॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 86 | Mantra No : 37

In Hindi:

ऋषि : त्रयऋषिगणाः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : ई॒शा॒नः । इ॒मा । भुव॑नानि । वि । ई॒य॒से॒ । यु॒जा॒नः । इ॒न्दो॒ इति॑ । ह॒रितः॑ । सु॒ऽप॒र्ण्यः॑ । ताः । ते॒ । क्ष॒र॒न्तु॒ । मधु॑ऽमत् । घृ॒तम् । पयः॑ । तव॑ । व्र॒ते । सो॒म॒ । ति॒ष्ठ॒न्तु॒ । कृ॒ष्टयः॑ ॥ ९.८६.३७

पदार्थ : (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! (ईशानः) आप ईश्वर हैं। (इमा भुवनानि) इन सब भुवनों को (वीयसे) चलाते हैं। (हरितः) हरणशील शक्तियें (सुपर्ण्यः) जो चेतन हैं, उनको (युजानः) नियुक्त करते हैं। (ताः) वे (ते) तुम्हारी शक्तियें (मधुमद्घृतं) मीठा प्रेम हमारे लिये (क्षरन्तु) बहायें (पयः) और दुग्धादि स्निग्ध पदार्थों का प्रदान करें। (सोम) हे परमात्मन् ! (तव व्रते) तुम्हारे नियम में (कृष्टयः) सब मनुष्य (तिष्ठन्तु) स्थिर रहें ॥३७॥

भावार्थ : इस मन्त्र में परमात्मा के नियम में स्थिर रहने का वर्णन है, जैसा कि “अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि” इत्यादि मन्त्रों में व्रत की प्रार्थना है। यहाँ भी परमात्मा के नियमरूप व्रत के परिपालन की प्रार्थना है ॥३७॥