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Rigveda / 9 / 86 / 38

त्वं नृ॒चक्षा॑ असि सोम वि॒श्वत॒: पव॑मान वृषभ॒ ता वि धा॑वसि । स न॑: पवस्व॒ वसु॑म॒द्धिर॑ण्यवद्व॒यं स्या॑म॒ भुव॑नेषु जी॒वसे॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 86 | Mantra No : 38

In Hindi:

ऋषि : त्रयऋषिगणाः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : त्वम् । नृ॒ऽचक्षाः॑ । अ॒सि॒ । सो॒म॒ । वि॒श्वतः॑ । पव॑मान । वृ॒ष॒भ॒ । ता । वि । धा॒व॒सि॒ । सः । नः॒ । प॒व॒स्व॒ । वसु॑ऽमत् । हिर॑ण्यऽवत् । व॒यम् । स्या॒म॒ । भुव॑नेषु । जी॒वसे॑ ॥ ९.८६.३८

पदार्थ : (सोम) हे परमात्मन् ! (त्वं) तुम (नृचक्षाः असि) मनुष्यों के कर्म्मों के भिन्न-२ फल देनेवाले हो और (पवमान) हे पवित्र करनेवाले ! (विश्वतः) सब प्रकार से (वृषभ) हे अनन्तशक्तियुक्त परमात्मन् ! (ता विधावसि) उन शक्तियों से आप हमको शुद्ध करें (सः) उक्त शक्तियुक्त आप (नः) हमको (पवस्व) पवित्र करें। आप (वसुमत्) ऐश्वर्य्यवाले और (हिरण्यवत्) प्रकाशवाले हैं। (वयं) हम (भुवनेषु) इस संसार में (जीवसे) जीने के लिये (स्याम) उक्त ऐश्वर्य्ययुक्त हों ॥३८॥

भावार्थ : इस मन्त्र में परमात्मा को कर्मों के साक्षीरूप से वर्णन किया है ॥३८॥