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Rigveda / 9 / 86 / 41

स भ॒न्दना॒ उदि॑यर्ति प्र॒जाव॑तीर्वि॒श्वायु॒र्विश्वा॑: सु॒भरा॒ अह॑र्दिवि । ब्रह्म॑ प्र॒जाव॑द्र॒यिमश्व॑पस्त्यं पी॒त इ॑न्द॒विन्द्र॑म॒स्मभ्यं॑ याचतात् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 86 | Mantra No : 41

In Hindi:

ऋषि : अत्रिः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : सः । भ॒न्दनाः॑ । उत् । इ॒य॒र्ति॒ । प्र॒जाऽव॑तीः । वि॒श्वऽआ॑युः । विश्वाः॑ । सु॒ऽभराः॑ । अहः॑ऽदिवि । ब्रह्म॑ । प्र॒जाऽव॑त् । र॒यिम् । अश्व॑ऽपस्त्यम् । पी॒तः । इ॒न्दो॒ इति॑ । इन्द्र॑म् । अ॒स्मभ्य॑म् । या॒च॒ता॒त् ॥ ९.८६.४१

पदार्थ : (सः) पूर्वोक्त कर्मयोगी (भन्दनाः) वन्दना (उदियर्ति) करता है, जो वन्दना (अहदिर्वि) सर्वदा (प्रजावतीः) शुभप्रजा को देनेवाली है तथा (विश्वायुः) सम्पूर्ण आयु को देनेवाली है और (विश्वाः) सब प्रकार की (सुभराः) पूर्तियों की करनेवाली है। (ब्रह्म) वेद (प्रजावत्) जो सदुपदेश द्वारा शुभप्रजाओं को देनेवाला है और (रयिं) धन और (अश्वपस्त्यं) अन्य गतिशील पदार्थों को देनेवाला है। (पीतः) नित्यतृप्त (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! आप (इन्द्रं) कर्मयोगी को तथा (अस्मभ्यं) हमारे लिये उक्त ऐश्वर्य (याचतात्) दें ॥४१॥

भावार्थ : इस मन्त्र में ऐश्वर्य्य की प्रार्थना करते हुए वेदों के सदुपदेशरूपी महत्त्व का वर्णन किया है ॥४१॥