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Rigveda / 9 / 86 / 42

सो अग्रे॒ अह्नां॒ हरि॑र्हर्य॒तो मद॒: प्र चेत॑सा चेतयत॒त अनु॒ द्युभि॑: । द्वा जना॑ या॒तय॑न्न॒न्तरी॑यते॒ नरा॑ च॒ शंसं॒ दैव्यं॑ च ध॒र्तरि॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 86 | Mantra No : 42

In Hindi:

ऋषि : अत्रिः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : सः । अग्रे॑ । अह्ना॑म् । हरिः॑ । ह॒र्य॒तः । मदः॑ । प्र । चेत॑सा । चे॒त॒य॒ते॒ । अनु॑ । द्युऽभिः॑ । द्वा । जना॑ । या॒तय॑न् । अ॒न्तः । ई॒य॒ते॒ । नरा॒ऽशंस॑म् । च॒ । दैव्य॑म् । च॒ । ध॒र्तरि॑ ॥ ९.८६.४२

पदार्थ : (सः सोमः) उक्त गुणसम्पन्न परमात्मा (अह्नामग्रे) इस दिन-रात से पहले (हर्य्यतो हरिः) हरण करनेवाली शक्तियों का हरण करनेवाला था। (मदः) आनन्दस्वरूप था और (अनु द्युभिः) द्युभ्वादि लोकों को  (चेतसा) अपनी चैतन्यरूप शक्ति से (प्रचेतयते) गतिशील करनेवाला था (द्वा जना) कर्मयोगी और ज्ञानयोगी दोनों पुरुषों को (यातयन्) वेदविधि से प्रेरणा करके (अन्तरीयते) इस द्युलोक और पृथिवीलोक के मध्य में गतिशील है (च) और (नरा) उक्त दोनों पुरुषों को (शंसं) प्रशंसनीय (दैव्यं) दिव्य (च) और (धर्तरि) धारणा विषय में सर्वोपरि बनाता है ॥४२॥

भावार्थ : वह परमात्मा इस प्रकृति की नानाविध शक्तियों को संयोजन करता हुआ कर्मयोगी और ज्ञानयोगी दोनों प्रकार के पुरुषों को प्रशंसनीय बनाता है ॥४२॥