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Rigveda / 9 / 91 / 4

रु॒जा दृ॒ळ्हा चि॑द्र॒क्षस॒: सदां॑सि पुना॒न इ॑न्द ऊर्णुहि॒ वि वाजा॑न् । वृ॒श्चोपरि॑ष्टात्तुज॒ता व॒धेन॒ ये अन्ति॑ दू॒रादु॑पना॒यमे॑षाम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 91 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : कश्यपः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : रु॒जा । दृ॒ळ्हा । चि॒त् । र॒क्षसः॑ । सदां॑सि । पु॒ना॒नः । इ॒न्दो॒ इति॑ । ऊ॒र्णु॒हि॒ । वि । वाजा॑न् । वृ॒श्च । उ॒परि॑ष्टात् । तु॒ज॒ता । व॒धेन॑ । ये । अन्ति॑ । दू॒रात् । उ॒प॒ऽना॒यम् । ए॒षा॒म् ॥ ९.९१.४

पदार्थ : और वह कर्म्मयोगी (रक्षसः) राक्षसों की (दृळ्हा सदांसि) दृढ़ सभाओं को (चित्) भी (रुजा) अपनी नाशक शक्ति से नष्ट कर देता है और (विवाजान्) न्यायकारी बलयुक्त पुरुषों की शक्तियों को (इन्दो) हे प्रकाशमान परमात्मन् ! तुम (ऊर्णुहि) आच्छादन करो और (उपरिष्टात्) जो ऊपर की ओर से आते हैं अथवा (दूरात्) दूर देश से जो आते हैं, (एषां) इन राक्षसों के (उपनायं) स्वामी को (तुजता वधेन) तीक्ष्ण वध से नाश करो ॥४॥

भावार्थ : जो पुरुष शम-दमादि साधनसम्पन्न होकर परमात्मपरायण होते हैं, परमात्मा उनके सब विघ्नों को दूर करता है और उनके विघ्नकारी राक्षसों का दमन करके उनके मार्ग को सुगम करता है ॥४॥