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Rigveda / 9 / 92 / 3

प्र सु॑मे॒धा गा॑तु॒विद्वि॒श्वदे॑व॒: सोम॑: पुना॒नः सद॑ एति॒ नित्य॑म् । भुव॒द्विश्वे॑षु॒ काव्ये॑षु॒ रन्तानु॒ जना॑न्यतते॒ पञ्च॒ धीर॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 92 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : कश्यपः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : प्र । सु॒ऽमे॒धाः । गा॒तु॒ऽवित् । वि॒श्वऽदे॑वः । सोमः॑ । पु॒ना॒नः । सदः॑ । ए॒ति॒ । नित्य॑म् । भुव॑त् । विश्वे॑षु । काव्ये॑षु । रन्ता॑ । अनु॑ । जना॑न् । य॒त॒ते॒ । पञ्च॑ । धीरः॑ ॥ ९.९२.३

पदार्थ : (सुमेधाः) शोभन प्रज्ञावाला और (गातुवित्) मार्ग के जाननेवाला (विश्वदेवः) जिसका ज्ञान सर्वत्र विद्यमान है, (सोमः) सर्वोत्पादक परमात्मा (पुनानः) सबको पवित्र करता हुआ परमात्मा (नित्यं) सदैव (सदः) उस स्थान को (एति) प्राप्त होता है, जिस स्थान में (विश्वेषु काव्येषु) सम्पूर्ण प्रकार की रचनाओं में (रन्ता) रमण करनेवाला योगी (पञ्चधीरः) पाँच प्रकार के (जनान्) प्राणों को (अनुयतते) लगाता है और लगाकर अर्थात् प्राणायाम करके (भुवत्) रमणशील होता है ॥३॥

भावार्थ : योगी पुरुष प्राणायाम द्वारा परमात्मा का साक्षात्कार करता है, इसी अभिप्राय से यह कथन किया है कि योगी को परमात्मा प्राप्त होता है। वास्तव में परमात्मा सर्वव्यापक है, उसका जाना-आना कहीं नहीं होता ॥३॥