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Rigveda / 9 / 97 / 8

प्र हं॒सास॑स्तृ॒पलं॑ म॒न्युमच्छा॒मादस्तं॒ वृष॑गणा अयासुः । आ॒ङ्गू॒ष्यं१॒॑ पव॑मानं॒ सखा॑यो दु॒र्मर्षं॑ सा॒कं प्र व॑दन्ति वा॒णम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 97 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : वृषगणो वासिष्ठः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : प्र । हं॒सासः॑ । तृ॒पल॑म् । म॒न्युम् । अच्छ॑ । अ॒मात् । अस्त॑म् । वृष॑ऽगणाः । अ॒या॒सुः॒ । आ॒ङ्गू॒ष्य॑म् । पव॑मानम् । सखा॑यः । दुः॒ऽमर्ष॑म् । सा॒कम् । प्र । व॒द॒न्ति॒ । वा॒णम् ॥ ९.९७.८

पदार्थ : (वृषगणाः) विद्वानों के गण (हंसासः) हंसों के समान विचरते हुए (तृपलम्) शीघ्र ही (मन्युमच्छ, अमात्, अस्तम्) दुष्टों के दमन करनेवाले उक्त परमात्मा को (आङ्गूष्यं) जो सबका लक्ष्य है और (पवमानम्) सबको पवित्र करनेवाला है, उसको (प्रायासुः) प्राप्त होते हैं, तदनन्तर (सखायः) परस्पर मैत्रीभाव से संगत होते हुए (वाणम्) भजनीय (दुर्मर्षम्) जो दुःख से प्राप्त होने योग्य लक्ष्य है, उस लक्ष्य के (साकम्) साथ-साथ (प्रवदन्ति) वर्णन करते हैं ॥८॥

भावार्थ : जो पुरुष परमात्मा के सद्गुणों को परम प्रेम से धारण करते हैं, वे मानो परमात्मा के साथ मैत्री करते हैं। वास्तव में परमात्मा किसी का शत्रु वा मित्र नहीं कहा जा सकता ॥८॥