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Rigveda / 9 / 97 / 9

स रं॑हत उरुगा॒यस्य॑ जू॒तिं वृथा॒ क्रीळ॑न्तं मिमते॒ न गाव॑: । प॒री॒ण॒सं कृ॑णुते ति॒ग्मशृ॑ङ्गो॒ दिवा॒ हरि॒र्ददृ॑शे॒ नक्त॑मृ॒ज्रः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 97 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : वृषगणो वासिष्ठः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : सः । रं॒ह॒ते॒ । उ॒रु॒ऽगा॒यस्य॑ । जू॒तिम् । वृथा॑ । क्रीळ॑न्तम् । मि॒म॒ते॒ । न । गावः॑ । प॒री॒ण॒सम् । कृ॒णु॒ते॒ । ति॒ग्मऽशृ॑ङ्गः । दिवा॑ । हरिः॑ । ददृ॑शे । नक्त॑म् । ऋ॒ज्रः ॥ ९.९७.९

पदार्थ : (सः) उक्त परमात्मा (रंहते) गतिशील है। (उरुगायस्य) सर्वोपासनीय परमात्मा की (जूतिम्) गति को स्मरण करते हुए (गावः) इन्द्रियें (न मिमते) उसके तत्त्व को नहीं पा सकतीं, जो (वृथा) अनायास से (क्रीळन्तम्) क्रीड़ा कर रहा है। (तिग्मशृङ्गः) अज्ञानों को नाश करनेवाला परमात्मा (परीणसम्) अनन्त प्रकार के ज्ञान का प्रकाश (कृणुते) करता है और (हरिः) जो परमात्मा (दिवानक्तम्) दिन-रात ज्ञानदृष्टि से (ऋज्रः) एक रस (ददृशे) देखा जाता है ॥९॥

भावार्थ : यद्यपि परमात्मा समय-समय पर उत्पत्ति, स्थिति और संहार का कारण है, तथापि उसके स्वरूप में कोई विकार न उत्पन्न होने से वह सदैव एकरस है ॥९॥