Rigveda / 9 / 113 / 9
यत्रा॑नुका॒मं चर॑णं त्रिना॒के त्रि॑दि॒वे दि॒वः । लो॒का यत्र॒ ज्योति॑ष्मन्त॒स्तत्र॒ माम॒मृतं॑ कृ॒धीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 113 | Mantra No : 9
In English:
Seer : kashyapaH | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : nichRRitpa~Nkti | Tone : pa~nchamaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : yatraanukaama.m charaNa.m trinaake tridive divaH . lokaa yatra jyotiShmantastatra maamamRRita.m kRRidhiindraayendo pari srava .
Component Words : yatra . anu.akaamam . charaNam . tri.anaake . tri.adive . divaH . lokaaH . yatra . jyotiShmantaH . tatra . maam . amRRitam . kRRidhi . indraaya . indo iti . pari . srava . 9.113.9
In Hindi:
ऋषि : कश्यपः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय :
पदपाठ : यत्र॑ । अ॒नु॒ऽका॒मम् । चर॑णम् । त्रि॒ऽना॒के । त्रि॒ऽदि॒वे । दि॒वः । लो॒काः । यत्र॑ । ज्योति॑ष्मन्तः । तत्र॑ । माम् । अ॒मृत॑म् । कृ॒धि॒ । इन्द्रा॑य । इ॒न्दो॒ इति॑ । परि॑ । स्र॒व॒ ॥ ९.११३.९
पदार्थ : (त्रिनाके, त्रिदिवे, दिवः) ज्ञानरूप स्वर्गलोक में (यत्र, अनुकामं, चरणं) जहाँ स्वेच्छानुसार विचरण होता है, (यत्र) जिसमें (ज्योतिष्मन्तः) केवल ज्ञान ही का (लोकाः) दर्शन है, (तत्र) वहाँ (मां) मुझको (अनृतं) मोक्षसुख का भागी (कृधि) करो। (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! आप (इन्द्राय) ज्ञानयोगी के लिये (परि, स्रव) पूर्णाभिषेक का निमित्त बनें ॥९॥
भावार्थ : मुक्त पुरुष मुक्ति अवस्था में अव्याहतगति होकर विचरता है अर्थात् उसको उस अवस्था में किसी प्रकार का बन्धन नहीं रहता, या यों कहो कि वह स्वतन्त्रतापूर्वक ईश्वरीय सत्ता में सम्मिलित होता है। हे परमपिता परमात्मन् ! आप ज्ञानयोगी तथा कर्मयोगी को अभिषिक्त करके वह अवस्था प्राप्त करायें ॥९॥
In Sanskrit:
ऋषि : कश्यपः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
पदपाठ : यत्र॑ । अ॒नु॒ऽका॒मम् । चर॑णम् । त्रि॒ऽना॒के । त्रि॒ऽदि॒वे । दि॒वः । लो॒काः । यत्र॑ । ज्योति॑ष्मन्तः । तत्र॑ । माम् । अ॒मृत॑म् । कृ॒धि॒ । इन्द्रा॑य । इ॒न्दो॒ इति॑ । परि॑ । स्र॒व॒ ॥ ९.११३.९
भावार्थ :