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Rigveda / 9 / 113 / 10

यत्र॒ कामा॑ निका॒माश्च॒ यत्र॑ ब्र॒ध्नस्य॑ वि॒ष्टप॑म् । स्व॒धा च॒ यत्र॒ तृप्ति॑श्च॒ तत्र॒ माम॒मृतं॑ कृ॒धीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 113 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : कश्यपः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय :

पदपाठ : यत्र॑ । कामाः॑ । नि॒ऽका॒माः । च॒ । यत्र॑ । ब्र॒ध्नस्य॑ । वि॒ष्टप॑म् । स्व॒धा । च॒ । यत्र॑ । तृप्तिः॑ । च॒ । तत्र॑ । माम् । अ॒मृत॑म् । कृ॒धि॒ । इन्द्रा॑य । इ॒न्दो॒ इति॑ । परि॑ । स्र॒व॒ ॥ ९.११३.१०

पदार्थ : (यत्र, कामाः) यहाँ सब काम (निकामाः) निष्काम किये जाते हैं (च) और (यत्र) यहाँ (ब्रध्नस्य) ब्रह्मज्ञान का (विष्टपं) सर्वोच्च पद है, (यत्र) यहाँ (स्वधा) अमृत (च) और उससे (तृप्तिश्च) तृप्ति है, (तत्र) वहाँ (मां) मुझको (अमृतं, कृधि) मोक्षपद प्राप्त करायें। (इन्दो) हे परमात्मन् ! आप (इन्द्राय) ज्ञानयोगी के (परि, स्रव) पूर्णाभिषेक का निमित्त बनें ॥१०॥

भावार्थ : हे परमात्मन् ! जो ब्रह्मज्ञान का उच्चपद है और जहाँ स्वधा से तृप्ति होती है, वह मोक्षरूप सुख मुझे प्रदान कीजिये, या यों कहो कि वह मुक्तिसुख जिससे एकमात्र ब्रह्मानन्द का ही अनुभव होता है, अन्य विषय सुख आदि जिस अवस्था में सब तुच्छ हो जाते हैं, वह मुक्ति अवस्था मुझे प्राप्त करायें ॥१०॥