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Rigveda / 10 / 21 / 7

त्वां य॒ज्ञेष्वृ॒त्विजं॒ चारु॑मग्ने॒ नि षे॑दिरे । घृ॒तप्र॑तीकं॒ मनु॑षो॒ वि वो॒ मदे॑ शु॒क्रं चेति॑ष्ठम॒क्षभि॒र्विव॑क्षसे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 21 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : विमद ऐन्द्रः प्राजापत्यो वा वसुकृद्वा वासुक्रः | देवता : अग्निः | छन्द : विराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय :

पदपाठ : त्वाम् । य॒ज्ञेषु॑ । ऋ॒त्विज॑म् । चारु॑म् । अ॒ग्ने॒ । नि । से॒दि॒रे॒ । घृ॒तऽप्र॑तीकम् । मनु॑षः । वि । वः॒ । मदे॑ । शु॒कम् । चेति॑ष्ठम् । अ॒क्षऽभिः॑ । विव॑क्षसे ॥ १०.२१.७

पदार्थ : (अग्ने) हे अग्रणायक परमात्मन् ! (यज्ञेषु) अध्यात्मयज्ञ प्रसङ्गों में उसको निमित्त बनाकर (त्वां चारुं घृतप्रतीकम् ऋत्विजम्) तुझ सेवनयोग्य तेजस्वी, अध्यात्मयज्ञ के सम्पादक को (शुक्रं चेतिष्ठम्) शुभ्र अत्यन्त चेतनावाले को (मनुषः निषेदिरे) उपासक जन आश्रय करते हैं (वः-मदे वि) तुझे हर्ष के निमित्त विशेषरूप से वरण करते हैं (विवक्षसे) तू विशिष्ट महान् है ॥७॥

भावार्थ : अध्यात्मयज्ञ के प्रसङ्गों में तेजस्वी, अध्यात्मयज्ञ के सम्पादक, सावधान करनेवाले परमात्मा की उपासकजन शरण लें, वही आनन्द हर्ष का साधक है और महान् है ॥७॥