Rigveda / 10 / 21 / 8
अग्ने॑ शु॒क्रेण॑ शो॒चिषो॒रु प्र॑थयसे बृ॒हत् । अ॒भि॒क्रन्द॑न्वृषायसे॒ वि वो॒ मदे॒ गर्भं॑ दधासि जा॒मिषु॒ विव॑क्षसे ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 21 | Mantra No : 8
In English:
Seer : vimada aindraH praajaapatyo vaa vasukRRidvaa vaasukraH | Devta : agniH | Metre : nichRRitpa~Nkti | Tone : pa~nchamaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : agne shukreNa shochiShoru prathayase bRRihat . abhikrandanvRRiShaayase vi vo made garbha.m dadhaasi jaamiShu vivakShase .
Component Words : agne . shukreNa . shochiShaa . uru . prathayase . bRRihat . abhi.akrandan . vRRiSha.ayase . vi . vaH . made . garbham . dadhaasi . jaamiShu . vivakShase . 10.21.8
In Hindi:
ऋषि : विमद ऐन्द्रः प्राजापत्यो वा वसुकृद्वा वासुक्रः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय :
पदपाठ : अग्ने॑ । शु॒क्रेण॑ । शो॒चिषा॑ । उ॒रु । प्र॒थ॒य॒से॒ । बृ॒हत् । अ॒भि॒ऽक्रन्द॑न् । वृ॒ष॒ऽय॒से॒ । वि । वः॒ । मदे॑ । गर्भ॑म् । द॒धा॒सि॒ । जा॒मिषु॑ । विव॑क्षसे ॥ १०.२१.८
पदार्थ : (अग्ने) हे अग्रणायक परमात्मन् ! (शुक्रेण शोचिषा) शुभ्र ज्ञानप्रकाश से (उरु बृहत् प्रथयसे) बहुत प्रकार से महान् प्रसिद्धि को प्राप्त होकर सर्वत्र व्याप्त है (अभिक्रन्दन् वृषायसे) ज्ञानोपदेश करता हुआ-अमृतवृष्टि करता हुआ प्रतिभासित हो रहा है (जामिषु गर्भं दधासि) तुझे प्राप्त करनेवाले उपासकों में वेदोपदेश को धारण कराता है (वः-मदे वि) तुझे हर्ष के निमित्त विशेषरूप से वरण करते हैं (विवक्षसे) तू महान् है ॥८॥
भावार्थ : अपने शुभ्र तेज से बहुप्रख्यात सर्वत्र व्यापक महान् परमात्मा ज्ञान का उपदेश करता हुआ तथा अमृतवृष्टि बरसाता हुआ उपासकों के अन्दर साक्षात् होता है। उसे आनन्द हर्ष के निमित्त वरना चाहिए ॥८॥
In Sanskrit:
ऋषि : विमद ऐन्द्रः प्राजापत्यो वा वसुकृद्वा वासुक्रः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
पदपाठ : अग्ने॑ । शु॒क्रेण॑ । शो॒चिषा॑ । उ॒रु । प्र॒थ॒य॒से॒ । बृ॒हत् । अ॒भि॒ऽक्रन्द॑न् । वृ॒ष॒ऽय॒से॒ । वि । वः॒ । मदे॑ । गर्भ॑म् । द॒धा॒सि॒ । जा॒मिषु॑ । विव॑क्षसे ॥ १०.२१.८
भावार्थ :