Rigveda / 10 / 27 / 13
प॒त्तो ज॑गार प्र॒त्यञ्च॑मत्ति शी॒र्ष्णा शिर॒: प्रति॑ दधौ॒ वरू॑थम् । आसी॑न ऊ॒र्ध्वामु॒पसि॑ क्षिणाति॒ न्य॑ङ्ङुत्ता॒नामन्वे॑ति॒ भूमि॑म् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 27 | Mantra No : 13
In English:
Seer : vasukra aindraH | Devta : indra: | Metre : paadanichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : patto jagaara pratya~nchamatti shiirShNaa shiraH prati dadhau varuutham . aasiina uurdhvaamupasi kShiNaati nya~N~Nuttaanaamanveti bhuumim .
Component Words : pattaH . jagaara . pratya~ncham . atti . shiirShNaa . shiraH . prati . dadhau . varuutham . aasiinaH . uurdhvaam . upasi . kShiNaati . nya~N . uttaanaam . anu . eti . bhuumim . 10.27.13
In Hindi:
ऋषि : वसुक्र ऐन्द्रः | देवता : इन्द्र: | छन्द : पादनिचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : प॒त्तः । ज॒गा॒र॒ । प्र॒त्यञ्च॑म् । अ॒त्ति॒ । शी॒र्ष्णा । शिरः॑ । प्रति॑ । द॒धौ॒ । वरू॑थम् । आसी॑नः । ऊ॒र्ध्वाम् । उ॒पसि॑ । क्षि॒णा॒ति॒ । न्य॒ङ् । उ॒त्ता॒नाम् । अनु॑ । ए॒ति॒ । भूमि॑म् ॥ १०.२७.१३
पदार्थ : (पत्तः) पादमात्र अर्थात वैश्वानर जागृतस्थान प्रथम पाद, तैजस स्वप्नस्थान दूसरा पाद, प्राज्ञ सुषुप्तिस्थान तीसरा पाद, नेतिनेति एकात्मस्वरूप शिव अद्वैत चतुर्थ पादरूप से (जगार) उपासकों द्वारा अपने अन्दर प्राप्त किया जाता है। वह परमात्मा (प्रत्यञ्चम्-अत्ति) प्रकट हुए जगत् को अपने अन्दर विलीन करता है (शीर्ष्णा शिरः) आत्मा से शिरोभूत अव्यक्त प्रकृति (वरूथं प्रतिदधौ) वरणीय अपने व्याप्त को फिर धारण करता है (ऊर्ध्वाम्-आसीनः) उत्कृष्ट मोक्ष को व्याप्त हुआ (उपसि) उपस्थान में धारण करता हुआ (क्षिणाति) जगद्रूप में परिणत करता है (उत्तानां भूमिं न्यङ्-अनु एति) ऊँची भूमि ऊँची स्थितिवाली सूक्ष्म कारण प्रकृति को नीचे जगद्रूप में प्रेरित करता है ॥१३॥
भावार्थ : उपासक जन परमात्मा को जागृति, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय स्थानवाले स्वरूप से अनुभव करते हैं। वह परमात्मा उत्पन्न जगत् को विलीन कर प्रकृतिरूप में कर देता है, पुनः उस व्याप्त प्रकृति को अपने आश्रय जगद्रूप में परिणत कर देता है ॥१३॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसुक्र ऐन्द्रः | देवता : इन्द्र: | छन्द : पादनिचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : प॒त्तः । ज॒गा॒र॒ । प्र॒त्यञ्च॑म् । अ॒त्ति॒ । शी॒र्ष्णा । शिरः॑ । प्रति॑ । द॒धौ॒ । वरू॑थम् । आसी॑नः । ऊ॒र्ध्वाम् । उ॒पसि॑ । क्षि॒णा॒ति॒ । न्य॒ङ् । उ॒त्ता॒नाम् । अनु॑ । ए॒ति॒ । भूमि॑म् ॥ १०.२७.१३
भावार्थ :