Rigveda / 10 / 27 / 14
बृ॒हन्न॑च्छा॒यो अ॑पला॒शो अर्वा॑ त॒स्थौ मा॒ता विषि॑तो अत्ति॒ गर्भ॑: । अ॒न्यस्या॑ व॒त्सं रि॑ह॒ती मि॑माय॒ कया॑ भु॒वा नि द॑धे धे॒नुरूध॑: ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 27 | Mantra No : 14
In English:
Seer : vasukra aindraH | Devta : indra: | Metre : paadanichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : bRRihannachChaayo apalaasho arvaa tasthau maataa viShito atti garbhaH . anyasyaa vatsa.m rihatii mimaaya kayaa bhuvaa ni dadhe dhenuruudhaH .
Component Words : bRRihan . achChaayaH . apalaashaH . arvaa . tasthau . maataa . vi.asitaH . atti . garbhaH . anyasyaaH . vatsam . rihatii . mimaaya . kayaa . bhuvaa . ni . dadhe . dhenuH . uudhaH . 10.27.14
In Hindi:
ऋषि : वसुक्र ऐन्द्रः | देवता : इन्द्र: | छन्द : पादनिचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : बृ॒हन् । अ॒च्छा॒यः । अ॒प॒ला॒शः । अर्वा॑ । त॒स्थौ । मा॒ता । विऽसि॑तः । अ॒त्ति॒ । गर्भः॑ । अ॒न्यस्याः॑ । व॒त्सम् । रि॒ह॒ती । मि॒मा॒य॒ । कया॑ । भु॒वा । नि । द॒धे॒ । धे॒नुः । ऊधः॑ ॥ १०.२७.१४
पदार्थ : (बृहन्) महान् परमात्मा (अच्छायः) छायारहित-केवल (अपलाशः) फलभोग से रहित (अर्वा) सर्वत्र प्राप्त (माता) मातृरूप-निर्माण करनेवाला (विषितः) बन्धनरहित-असीम (तस्थौ) अधिष्ठातारूप में विराजमान है, तथा (गर्भः-अत्ति) सब को अपने अन्दर ग्रहण करनेवाला होता हुआ प्रलय में अपने अन्दर सब को ले लेता है (अन्यस्याः वत्सं रिहती) दूसरे के बच्चे को चूमती हुई गौ के समान (मिमाय) स्नेह से शब्द करता है-वेद का प्रवचन करता है (कया भुवा) किसी आन्तरिक भावना से (धेनुः-ऊधः-निदधे) जैसे गौ अपने दूध भरे स्तनयुक्त अङ्ग को बछड़े के लिये नीचे करती है, ऐसे ही परमात्मा जीव को स्तनरूप स्वाश्रय में धारण करता है ॥१४॥
भावार्थ : परमात्मा महान् स्वस्वरूप में अनुपम केवल फलभोग से रहित सर्वत्र व्याप्त सब का निर्माता और अधिष्ठाता है। सब संसार को अपने अन्दर रखता है, सबकी स्थिति का स्थापक है। जीवात्मा को अपने आश्रय में कर्मफल भोग कराता है ॥१४॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसुक्र ऐन्द्रः | देवता : इन्द्र: | छन्द : पादनिचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : बृ॒हन् । अ॒च्छा॒यः । अ॒प॒ला॒शः । अर्वा॑ । त॒स्थौ । मा॒ता । विऽसि॑तः । अ॒त्ति॒ । गर्भः॑ । अ॒न्यस्याः॑ । व॒त्सम् । रि॒ह॒ती । मि॒मा॒य॒ । कया॑ । भु॒वा । नि । द॒धे॒ । धे॒नुः । ऊधः॑ ॥ १०.२७.१४
भावार्थ :