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Rigveda / 10 / 27 / 15

स॒प्त वी॒रासो॑ अध॒रादुदा॑यन्न॒ष्टोत्त॒रात्ता॒त्सम॑जग्मिर॒न्ते । नव॑ प॒श्चाता॑त्स्थिवि॒मन्त॑ आय॒न्दश॒ प्राक्सानु॒ वि ति॑र॒न्त्यश्न॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 27 | Mantra No : 15

In Hindi:

ऋषि : वसुक्र ऐन्द्रः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : स॒प्त । वी॒रासः॑ । अ॒ध॒रात् । उत् । आ॒य॒न् । अ॒ष्ट । उ॒त्त॒रात्ता॑त् । सम् । अ॒ज॒ग्मि॒र॒न् । ते । नव॑ । प॒श्चाता॑त् । स्थि॒वि॒ऽमन्तः॑ । आ॒य॒न् । दश॑ । प्राक् । सानु॑ । वि । ति॒र॒न्ति॒ । अश्नः॑ ॥ १०.२७.१५

पदार्थ : (सप्त वीरासः-अधरात्-उदायन्) विराड्रूप परमात्मा के रचित गतिमान् पृथिव्यादि लोक स्थूलरूप में प्रकट हुए हैं (उत्तरात्तात् ते अष्ट समजग्मिरन्) सूक्ष्मरूप में वे आठ वसु-वसानेवाले देव वायु आदि सर्वत्र वहनेवाले उत्पन्न हुए (पश्चातात्-नव स्थिविमन्तः-आयन्) पश्चात् नौ ग्रह चन्द्र  आदि आधार को अपेक्षित करनेवाले प्रकटीभाव को प्राप्त हुए (दश-अश्नः प्राक् सानु वितिरन्ति) दश व्याप्त पूर्व से पूर्वादि दिशाएँ स्थानमात्र को विकसित करती हैं-आश्रय देती हैं ॥१५॥

भावार्थ : परमात्मा ने घूमनेवाले पृथिवी आदि लोकों को, वायु आदि सूक्ष्म वसुओं को, चन्द्र आदि आश्रय पानेवाले ग्रहों और दूसरों को आश्रय देनेवाली दिशाओं को उत्पन्न कर धारा हुआ है ॥१५॥