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Rigveda / 10 / 28 / 11

तेभ्यो॑ गो॒धा अ॒यथं॑ कर्षदे॒तद्ये ब्र॒ह्मण॑: प्रति॒पीय॒न्त्यन्नै॑: । सि॒म उ॒क्ष्णो॑ऽवसृ॒ष्टाँ अ॑दन्ति स्व॒यं बला॑नि त॒न्व॑: शृणा॒नाः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 28 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : इन्द्रवसुक्रयोः संवाद ऐन्द्रः | देवता : इन्द्र: | छन्द : पादनिचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : तेभ्यः॑ । गो॒धाः । अ॒यथ॑म् । क॒र्ष॒त् । ए॒तत् । ये । ब्र॒ह्मणः॑ । प्र॒ति॒ऽपीय॑न्ति । अन्नैः॑ । सि॒मः । उ॒क्ष्णः॑ । अ॒व॒ऽसृ॒ष्टान् । अ॒द॒न्ति॒ । स्व॒यम् । बला॑नि । त॒न्वः॑ । शृ॒णा॒नाः ॥ १०.२८.११

पदार्थ : (ये ब्रह्मणः-अन्नैः प्रतिपीयन्ति) जो शरीर में रोग या राष्ट्र में उपद्रवकारी, शरीर में प्राण को और राष्ट्र में ब्रह्मास्त्रवेत्ता राज्यमन्त्री को, अन्नदोषों से या अन्नको निमित्त बनाकर पीड़ित करते हैं, तथा (तन्वः-बलानि स्वयं शृणानाः) शरीर के या राष्ट्रकलेवर के बलों को स्वतः नष्ट करते हुए (सिमः-अवसृष्टान्-उक्ष्णः-अदन्ति) सब शरीर में सङ्गत रस रक्त बहानेवाले यकृतादि पिण्डों को राष्ट्र में सम्बद्ध आदेश विभागों को खाते हैं (तेभ्यः) उनको (एतत्-गोधाः-अयथं कर्षत्) शरीर में ये प्रगतिधारिका नाड़ी या राष्ट्र में विद्युत्तन्त्री अनायास शरीर से या राष्ट्र से बाहर निकाल देती है ॥११॥

भावार्थ : शरीर में अन्नदोषों से हुए रोग प्राण को हानि पहुँचाते हैं और शरीर के बलों को नष्ट करते हुए रसरक्त-सेचक पिण्डों को भी गला देते हैं, तथा राष्ट्र में अन्न को निमित्त बना-कर उपद्रवकारी राज्यमन्त्री को पीड़ित करते हैं और राष्ट्र के बलों को उद्दण्ड होकर नष्ट करते हुए राष्ट्र के बढ़ानेवाले विभागों को ध्वस्त करते हैं, उनको बिजली की तन्त्री या अस्त्रशक्ति से राष्ट्र से बाहर निकाल देना चाहिये ॥११॥