Rigveda / 10 / 28 / 12
ए॒ते शमी॑भिः सु॒शमी॑ अभूव॒न्ये हि॑न्वि॒रे त॒न्व१॒॑: सोम॑ उ॒क्थैः । नृ॒वद्वद॒न्नुप॑ नो माहि॒ वाजा॑न्दि॒वि श्रवो॑ दधिषे॒ नाम॑ वी॒रः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 28 | Mantra No : 12
In English:
Seer : indravasukrayoH sa.mvaada aindraH | Devta : indra: | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : ete shamiibhiH sushamii abhuuvanye hinvire tanva1H soma ukthaiH . nRRivadvadannupa no maahi vaajaandivi shravo dadhiShe naama viiraH .
Component Words : ete . shamiibhiH . su.ashamii . abhuuvan . ye . hinvire . tanvaH . some . ukthaiH . nRRi.avat . vadan . upa . naH . maahi . vaajaan . divi . shravaH . dadhiShe . naama . viiraH . 10.28.12
In Hindi:
ऋषि : इन्द्रवसुक्रयोः संवाद ऐन्द्रः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : ए॒ते । शमी॑भिः । सु॒ऽशमी॑ । अ॒भू॒व॒न् । ये । हि॒न्वि॒रे । त॒न्वः॑ । सोमे॑ । उ॒क्थैः । नृ॒ऽवत् । वद॑न् । उप॑ । नः॒ । मा॒हि॒ । वाजा॑न् । दि॒वि । श्रवः॑ । द॒धि॒षे॒ । नाम॑ । वी॒रः ॥ १०.२८.१२
पदार्थ : (ये सोमे-उक्थैः-तन्वः-हिन्विरे) जो सुन्दर सुखनिमित्त अन्नों द्वारा शरीरों या प्रजाओं को बढ़ाते हैं (एते शमीभिः सुशमी-अभूवन्) ये ही कर्मों के द्वारा शुभकर्मा देहकारी या राज्याधिकारी सुखभागी होते हैं (नृवत्-वदन् नः-वाजान्-उप-माहि) हे आत्मन् या राजन् ! तू नेता ही बोलता हुआ घोषित करता हुआ हम प्राण जैसे या राज्यमन्त्री जैसों के लिये भोगों को उपहृत कर-भेंट दे (वीरः-दिवि श्रवः-नाम दधिषे) वीर होता हुआ दिव्य शरीर में या दिव्य राजपद पर यशोरूप नाम धारण कर ॥१२॥
भावार्थ : उत्तम सुख के निमित्त अन्नों द्वारा श्रेष्ठ देहधारी बनना आत्मशक्ति के द्वारा उत्तम अध्यात्मभोगों को सिद्ध करना, यशस्वी प्रसिद्ध करना जीवन का लक्ष्य है तथा विविध अन्नों से राष्ट्र में सुखप्रसार करना, श्रेष्ठ कर्मों के आचरणों से शरीरवान् बनाना, राजा के आदेश में रहकर सुख भोगना, यशस्वी प्रसिद्ध करना, राज्य की सफलता है ॥१२॥
In Sanskrit:
ऋषि : इन्द्रवसुक्रयोः संवाद ऐन्द्रः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : ए॒ते । शमी॑भिः । सु॒ऽशमी॑ । अ॒भू॒व॒न् । ये । हि॒न्वि॒रे । त॒न्वः॑ । सोमे॑ । उ॒क्थैः । नृ॒ऽवत् । वद॑न् । उप॑ । नः॒ । मा॒हि॒ । वाजा॑न् । दि॒वि । श्रवः॑ । द॒धि॒षे॒ । नाम॑ । वी॒रः ॥ १०.२८.१२
भावार्थ :