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Rigveda / 10 / 29 / 3

कस्ते॒ मद॑ इन्द्र॒ रन्त्यो॑ भू॒द्दुरो॒ गिरो॑ अ॒भ्यु१॒॑ग्रो वि धा॑व । कद्वाहो॑ अ॒र्वागुप॑ मा मनी॒षा आ त्वा॑ शक्यामुप॒मं राधो॒ अन्नै॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 29 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : वसुक्रः | देवता : इन्द्र: | छन्द : पादनिचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : कः । ते॒ । मदः॑ । इ॒न्द्र॒ । रन्त्यः॑ । भू॒त् । दुरः॑ । गिरः॑ । अ॒भि । उ॒ग्रः । वि । धा॒व॒ । कत् । वाहः॑ । अ॒र्वाक् । उप॑ । मा॒ । म॒नी॒षा । आ । त्वा॒ । श॒क्या॒म् । उ॒प॒ऽमम् । राधः॑ । अन्नैः॑ ॥ १०.२९.३

पदार्थ : (इन्द्र) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन् ! (ते) तेरे लिये (कः-मदः-रन्त्यः-भूत्) कौनसा स्तुतिसमूह-मन्त्रभाग रमण करने योग्य है, जो भी हो (दुरः-अभि धाव) उसे द्वार बनाकर प्राप्त हो (गिरः-वि० “धाव”) हमारे प्रार्थनावचनों के प्रति विशिष्टरूप से प्राप्त हो, उन्हें स्वीकार कर (मनीषा कद्-वाहः-अर्वाक्-मा-उप) स्तुति के द्वारा कब हमारे वहनीय-प्रापणीय तू मुझे-मेरी ओर प्राप्त होगा (अन्नैः) उपासना-रसों द्वारा (उपमं त्वा राधः) समीप वर्तमान तुझ आराधनीय परमात्मा को (आ शक्याम्) प्राप्त कर सकूँ ॥३॥

भावार्थ : उपासक को परमात्मा की ऐसे मन्त्रों द्वारा स्तुतियाँ करनी चाहिये, जिससे कि वह परमात्मा उन्हें स्वीकार करे और अपने अन्दर किये उपासनाभावों से वह प्राप्त हो सके ॥३॥