Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 29 / 4

कदु॑ द्यु॒म्नमि॑न्द्र॒ त्वाव॑तो॒ नॄन्कया॑ धि॒या क॑रस॒य कन्न॒ आग॑न् । मि॒त्रो न स॒त्य उ॑रुगाय भृ॒त्या अन्ने॑ समस्य॒ यदस॑न्मनी॒षाः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 29 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वसुक्रः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : कत् । ऊँ॒ इति॑ । द्यु॒म्नम् । इ॒न्द्र॒ । त्वाऽव॑तः । नॄन् । कया॑ । धि॒या । क॒र॒से॒ । कत् । नः॒ । आ । अ॒ग॒न् । मि॒त्रः । न । स॒त्यः । उ॒रु॒ऽगा॒य॒ । भृ॒त्यै । अन्ने॑ । स॒म॒स्य॒ । यत् । अस॑न् । म॒नी॒षाः ॥ १०.२९.४

पदार्थ : (इन्द्र कत्-उ द्युम्नम्) हे ऐश्वर्यवन् ! परमात्मन् ! कब ही हमारे अन्दर वह यश होगा (त्वावतः नॄन् कया धिया करसे) तेरे जैसे मुक्त हम उपासक जनों को किस स्तुति से करेगा (कत् नः-आ-अगन्) कब मैं प्राप्त होऊँगा (उरुगाय) हे बहुत स्तुति करने योग्य या बहुत कीर्तन करने योग्य परमात्मन् ! (सत्यः-मित्रः-न) स्थिर मित्र के समान (भृत्यै) पोषण के लिये (समस्य) सब के (अन्ने) अन्न प्रदान करने के निमित्त-भोगप्रदान करने के निमित्त (मनीषाः-यत्-असन्) स्तुतियाँ जिससे सफल होवें ॥४॥

भावार्थ : परमात्मा उपासक जनों का मित्र है, उसकी विशेष स्तुति करनी चाहिये, जिससे संसार में रहते हुए ऊँचा यशस्वी बने और मुक्ति में उसके सङ्ग का आनन्दलाभ ले सके ॥४॥