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Rigveda / 10 / 34 / 9

नी॒चा व॑र्तन्त उ॒परि॑ स्फुरन्त्यह॒स्तासो॒ हस्त॑वन्तं सहन्ते । दि॒व्या अङ्गा॑रा॒ इरि॑णे॒ न्यु॑प्ताः शी॒ताः सन्तो॒ हृद॑यं॒ निर्द॑हन्ति ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 34 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : कवष ऐलूष अक्षो वा मौजवान् | देवता : अक्षकृषिप्रशंसा | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : नी॒चाः । व॒र्त॒न्ते॒ । उ॒परि॑ । स्फु॒र॒न्ति॒ । अ॒ह॒स्तासः॑ । हस्त॑ऽवन्तम् । स॒ह॒न्ते॒ । दि॒व्याः । अङ्गा॑राः । इरि॑णे । निऽउ॑प्ताः । शी॒ताः । सन्तः॑ । हृद॑यम् । निः । द॒ह॒न्ति॒ ॥ १०.३४.९

पदार्थ : (नीचा वर्त्तन्ते-उपरि स्फुरन्ति) ये जुए के पाशे कभी नीचे गये हुए अर्थात् स्वाधीन होते हैं, कभी ऊपर अर्थात् जुआरी को हरानेवाले होते हैं (अहस्तासः-हस्तवन्तं सहन्ते) हाथों से रहित हुए या हाथ से छूटे हुए हाथवाले-हाथ से फैंकनेवाले जुआरी मनुष्य को अभिभूत करते हैं-उसे दबाते हैं (दिव्याः अङ्गाराः) अलौकिक अङ्गारे बने हुए (इरिणे न्युप्ताः शीताः सन्तः) तृण-काष्ठ आदि रहित प्रदेश में गिरे हुए ठण्डे होते भी (हृदयं निर्दहन्ति) जुआरी के अन्तःकरण को दग्ध करते हैं-जलाते हैं। यह जुए का दुष्फल है ॥९॥

भावार्थ : जुए के पाशे चाहे हराते हुए हों, चाहे जिताते हुए हों, वे ठण्डे अङ्गारे से बनकर जुआरी के हृदय को जलाते रहते हैं-अशान्त किये रहते हैं, इसलिये जुआ खेलना बुरा है ॥९॥